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आईआईएचएस, अकादमिक सम्मेलनों, सेमिनारों, और वार्ताओं से लेकर फिल्म प्रदर्शनों, चर्चाओं, प्रस्तुतिकरणों, और प्रदर्शनियों तक, नियमित सार्वजनिक संवाद की श्रृंखला आयोजित करता है। इनमें से अनेक, कार्यक्रमों की दो संरक्षित श्रृंखलाओं के अंतर्गत किए जाते हैं जो पब्लिक्स@ आईआईएचएस तथा पब्लिक टेक्स्ट्‌स कहलाते हैं। हमारे पूर्व आयोजनों को देखने के लिए दायीं ओर की टैब पर क्लिक करें।

आगामी तथा हाल के आयोजन

First Cry
सार्वजनिक फिल्म प्रदर्शनः 28 अक्टूबर 2014, 6.30 बजे अपरान्ह
फर्स्ट क्राई
अवधि: 52 मिनट

सारांश
यह दल्ली-राजहरा छत्तीसगढ़ के खनन कस्बे में एक उल्लेखनीय अस्पताल की कहानी है जो शहीद अस्पताल कहलाता है। इस अस्पताल को दैनिक ठेका खनन मजदूरों द्वारा अपने खर्च और स्वयंसेवा करके बनवाया गया है और यह कामगारों, आदिवासियों व निर्धनों के लिए सफलतापूर्वक आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराता है। फिल्म इसके निर्माण के इतिहास, अस्पताल की मुख्य घटनाओं, तथा डॉक्टरों और कामगारों-पैरामेडिक्स के अनुभवों को उजागर करती है जिन्होंने इस आशा की किरण को बनाए रखा है।

निर्देशक के बारे में
स्कूल के दिनों से स्थानीय राजनीति में सक्रिय भागीदारी करने वाले अजय टी.जी., एक फिल्म निर्माता व मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। वर्तमान में वे नागरिक अधिकारों के लिए छत्तीसगढ़ के लोगों के संघ के संयुक्त सचिव हैं। वे औद्योगीकरण, कारीगर, जाति और श्रम से संबंधित परियोजनाओं पर सामाजिक मानवविज्ञानियों हेतु अनुसंधान सहायक के रूप में भी कार्य करते रहे हैं। 1999 और 2002 के बीच, अजय ने भिलाई, छत्तीसगढ़ में यूरोपीय संघ द्वारा प्रायोजित फिल्म प्रशिक्षण डिप्लोमा पाठ्‌यक्रम में फिल्म निर्माण के सभी पहलुओं पर प्रशिक्षण प्राप्त किया। अजय की फिल्म लिविंग मेमॅरी का प्रदर्शन दक्षिण एशियाई वृत्तचित्र एवं फिल्म महोत्सव, किंग्स कॉलेज, तथा कैम्ब्रिज साउथ एशिया फोरम, कैम्ब्रिज, यूके 2003 में किया गया। वे एक फोटोग्राफर भी हैं, उनकी फोटो-प्रदर्शनी – छत्तीसगढ़ के कुम्हार, का आयोजन शेफर्ड’स बुश पब्लिक लाइब्रेरी व हैमरस्मिथ पब्लिक लाइब्रेरी, लंदन में किया गया।


Kapuscinski Development Lecture

बुधवार 05 नवम्बर, 2014 | 18.00-19.30

कैपुसिंस्की विकास व्याख्यान
2030 धारणीय विकास लक्ष्यों के केंद्र में नगर को स्थापित किया जाना

वक्ताः अरोमार रेवी, निदेशक, इंडियन इंस्टीट्‌यूट फॉर ह्‌यूमन सेटलमेन्ट्‌स, बंगलौर
आयोजनस्थलः यूसीटी अपर कैम्पस, न्यू स्नेप बिल्डिंग

सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों की समयअवधि समाप्त हो रही है और अब इनके स्थान पर 2030 के लिए सार्वजनिक रूप से स्वीकार्य तथा स्थानीय रूप से लागू करने योग्य धारणीय विकास के लक्ष्यों (एसडीजी) का नया सेट लाने की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन की वार्ताओं में स्थिरता है और उपेक्षा के प्रभावों से बचाव के लिए अधिक दृढ़निश्चयी और व्यावहारिक प्रविधि की आवश्यकता है। यह स्पष्ट है कि अपेक्षाकृत अधिक धारणीयता, तथा समस्त नागरिकों का उत्पादक आर्थिक जीवन व बेहतरी में समावेश करने के लिए एक भिन्न आर्थिक, सामाजिक और मानवीय पथ अवश्य स्थापित करना होगा। ऐसा करने के लिए पूरे विश्व के नागरिकों एवं क्षेत्रों को अवसर दिया जाना चाहिए।

अफ्रीका और एशिया, विश्व में अगले दो दशकों के दौरान होने वाले नगरीय, सामाजिक एवं आर्थिक पारगमन (रूपांतरण) के केंद्र में रहेंगे। यह महत्त्वपूर्ण है कि हम इन भौगोलिक क्षेत्रों से स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक विषयों पर व्यवहार करने वाली राजनैतिक कल्पनाओं तथा नेतृत्वों को देखें। इस व्याख्यान में नीतिनिर्माताओं, कार्यकर्ताओं, बिजनेस लीडरों, पत्रकारों और अकादमिक लोगों की रूचि होग।

पर लाइव स्ट्रीमिंग: http://www.kapuscinskilectures.eu

पूर्व आयोजन

2014

जिन्नशास्त्र वंशावलीः पुरालेखी स्मृतिलोप, तथा दिल्ली में विभाजन पश्चात इस्लामी धर्मशास्त्र

20 अक्टूबर, 2014  |  6.30-8.00 अपरान्ह | आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस

धर्मशास्त्र, तथा नगरीय जीवन की परिवर्तनशील संरचनाओं के बीच क्या संबंध है? समकालीन दिल्ली में, लम्बे समय से जिन्नों के बारे में कही जाने वाली कहानियां, लोगों के बीच शताब्दियों का फासला मिटाते हुए उन्हें जोड़ती हैं। जीर्ण मध्यकालीन महल में जिन्न-संतों के समक्ष प्रस्तुत याचिकाएं, न्याय के मध्यकालीन विचार, आधुनिक नौकरशाही की तकनीकों के साथ एकाकार होते हैं। ये कहानियां और कर्मकाण्ड, एक धर्मशास्त्रीय नवीनता को प्रमाणित करते हैं जो उपनिवेश पश्चात नगर के आध्यात्मिक तथा भौतिक भूभागों के रूपांतरणों से गुंथी हुई है। जिन्न, मानचित्रों में रिक्त स्थानों पर उपस्थित हैं, जहां नौकरशाही की योजनाएं, न्यायपालिका के आदेश, और विभाजन पश्चात भारतीय राज्यों की अवैधता, नगर के मुस्लिम भूभागों के व्यापक विलोपन का प्रयास करने के लिए एकाकार होते हैं। जिन्नशास्त्र, जिन्न के दीर्घकालीन अस्तित्व द्वारा स्मृति की मानवीय श्रृंखलाओं का अधिक्रमण, नौकरशाही द्वारा निर्मित वर्तमान के रिक्त, समांगी समय के सापेक्ष अन्य ऐहिकताओं, राजनैतिक विचारधाराओं, तथा साक्षी स्वरूपों को लाते हुए राज्य के जादुई स्मृतिलोप को चुनौती देता है।

वक्ता के विषय में

आनंद विवेक तनेजा, ऐतिहासिक विद्वान, मानवविज्ञानी हैं जो नगरीय दक्षिण एशिया में इस्लाम पर कार्य करते हैं। दक्षिण एशिया में ऐतिहासिक तथा समकालीन इस्लाम, और अंतर-पंथ संबंध, धर्म का मानवशास्त्र, दैनिक जीवन एवं उपनिवेश पश्चात नगरीकरण, तथा बम्बई सिनेमा, उनके शोध एवं शिक्षण में शामिल हैं।


सूचना युग में पदानुक्रम से विषमक्रम तक-कर्नाटक में राज्य तथा पालिका सुधार कार्यक्रम

16 अक्टूबर, 2014   |  6.30-8.00 अपरान्ह | आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस
इस प्रस्तुतिकरण में, विकास की ‘विषम समस्याओं’ के समाधान हेतु उपयुक्त कही जाने वाली उभरती सांगठनिक एवं संस्थागत व्यवस्था-‘विषमक्रम’ में राज्य की भूमिका का परीक्षण करने के लिए कर्नाटक में पालिका सुधार कार्यक्रमों का उपयोग किया गया है। दो सुधारों, हेल्पलाइन और आस्थी के परिणामों की जांच करते हुए, परिकल्पित परिणाम सुनिश्चित करने में राज्य की केंद्रीयता के महत्त्व को प्रस्तुतिकरण में प्रदर्शित किया गया है।

वक्ता के विषय में

डॉ. अंजली के. मोहन, आईआईटी बंगलौर से ई-प्रशासन में पीएचडी करने के साथ क्षेत्रीय योजनाकार हैं। विकास, प्रशासन, सार्वजनिक नीति एवं सूचना एवं संचार तकनीकें तथा विकास (सीटीडी) उनके शोध क्षेत्रों में शामिल हैं।


यूक्रेनः लेन्स के माध्यम से

नवम्बर 2013 में, कोई भी अनुमान नहीं लगा सका था कि कीव में शांतिपूर्ण विरोधप्रदर्शन करने वाले युवाओं का एक समूह, ऐसी चिन्गारी भड़का देगा जो एक भ्रष्ट सरकार के पतन का कारण बनेगी। यातायात की भीड़ वाला मुख्य इंडिपेंडेस स्क्वॉयर, धीरे-धीरे नगर के अंदर एक नगर बन गया। यूरोप को लेकर प्रदर्शन, सभी यूक्रेनवासियों का जीवन बदल देने वाला विरोध बन गया-और एक ऐसा युद्ध जिसका कोई अनुमान नहीं लगा सका था।

अमेरिकी प्रवासी किर्स्टन मेहर ने कीव में अपनी मौजूदगी के दौरान ये फोटो लिए थे। अपने लेन्स से उन्होंने न केवल लोगों द्वारा महसूस किए जाने वाले भय, आतंक को बल्कि उस निर्दोष आकर्षण और अनूठे भूदृश्यों को भी कलात्मकता से कैमरे में कैद किया जो यूक्रेन को अद्वितीय बनाते हैं। उस समय वहां उपस्थित एलिसन डम्बवेल ने यह भारत में हमें प्रदान किए।

बेहतर भविष्य के लिए यूक्रेनवासियों के संघर्ष के बारे में अधिक जानने के लिए कृपया आईआईएचएस, बंगलौर में गैलरी में पधारें, जो यूरोप से प्रेरित था, लेकिन यूरोपीय लोगों व पूरे विश्व के लिए प्रेरणा बन गया।


‘एसीटी’- रंगमंच अभिनय कार्यशाला

‘रंगमंच वह प्रिज्म है, जिसके माध्यम से आप चीजों को नए नजरिए से देख सकते हैं।’

हममें से जो लोग यह सोचते हैं कि रंगमंच महज प्रबल, नाटकीय प्रयास होता है, इसके लिए बहुत विशेष प्रतिभा और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है-हम आपको ‘ACT’ में भागीदारी के लिए आमंत्रित करते हैं, जो कि शनिवार 23 अगस्त को आयोजित एक रंगमंच अभिनय कार्यशाला है। ACT मस्तिष्क की एक अन्वेषणात्मक अभिव्यक्ति है।

यह रंगमंच कार्यशाला, प्रतिभागियों को रंगमंच के सूक्ष्मतर पहलुओं का अन्वेषण करने के लिए प्रेरित करेगी-जैसे कि सांस, आवाज, लय और शरीर। यह अन्वेषण मनोरंजन और हास्य के वातावरण में होगा, जो रंगमंच खेलों और सुधारात्मक अभ्यासों द्वारा सृजित किया जाएगा।


वीके मूर्ति रेट्रोस्पेक्टिव (अनुदर्शन)

आईआईएचएस अनुभव, सुचित्रा फिल्म सोसाइटी तथा लेस फिल्म्स के सहयोग से महान सिनेमैटोग्राफर वीके मूर्ति की फिल्मों के प्रदर्शन द्वारा उनके प्रति श्रद्धांजलि का आयोजन कर रहा है।

सुचित्रा फिल्म सोसाइटी ने 23 से 25 मई के बीच तीन फिल्मों, बाज़ी, कागज़ के फूल तथा साहिब बीवी और गुलाम का प्रदर्शन किया। जीएस भास्कर द्वारा तथा सिनेमैटोग्राफी पर मनोहर जोशी द्वारा प्रस्तुतिकरणों के साथ एक सुव्यवस्थित कार्यशाला का भी आयोजन किया गया।

श्रद्धांजलि के अगले चरण में, आईआईएचएस अनुभव द्वारा 30 मई को 6 बजे अपरान्ह प्यासा फिल्म का तथा 31 मई को 3 बजे अपरान्ह कागज़ के फूल, तथा इसी दिन अपरान्ह 6 बजे मिस्टर एंड मिसेज 55 का प्रदर्शन किया जाएगा। ये प्रदर्शन सभी के लिए खुले हैं।

वीके मूर्ति के बारे में

दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से पहली बार सम्मानित होने वाले तकनीशियन वीके मूर्ति गुरूदत्त की महान फिल्मों प्यासा और साहिब बीवी और गुलाम में अपने कैमरा कार्य के लिए प्रसिद्ध हुए।

मूर्ति को भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म कागज़ के फूल फिल्माने का श्रेय भी जाता है, वे महान फिल्मकार गुरूदत्त की सभी फिल्मों में अपने बेहतरीन कैमरा कार्य के लिए सदैव याद किए जाएंगे।

चौदहवीं का चांद गाने का उनके द्वारा किया गया फिल्मांकन, हिंदी सिनेमा में अभी तक किए गए सबसे उत्तम सिनेमैटोग्राफिक कार्यों में शुमार किया जाता है। मूर्ति ने 1950 के दशक में गुरूदत्त के साथ अपने आरंभिक सहयोग से लेकर श्याम बेनेगल के भव्य धारावाहिक भारत एक खोज में अपने कार्य, और 1993 में हूवा हन्नू नामक एक प्रतिष्ठित कन्नड़ फिल्म तक, चार दशकों तक कार्य किया,


लोक वार्ता

NH-Ravindranath

जलवायु परिवर्तन 2014
जलवायु परिवर्तन का न्यूनीकरण- आईपीसीसी मूल्यांकन रिपोर्ट 5

वृहस्पतिवार, 01 मई, 2014 3.00 बजे अपरान्ह-5.00 बजे अपरान्ह   |  आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस

एन एच रविंद्रनाथ
प्रोफेसर, धारणीय प्रौद्योगिकी केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलौर

जलवायु परिवर्तन न्यूनीकरण पर आईपीसीसी कार्यदल III की रिपोर्ट पर आईआईएचएस के निदेशक अरोमार रेवी की प्रोफेसर एन एच रविंद्रनाथ से वार्ता

जीवन परिचय

प्रो. रविंद्रनाथ ने जलवायु परिवर्तन के विविध आयामों-न्यूनीकरण, मूल्यांकन, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, भूमि उपयोग सेक्टरों में इन्वेन्टरी, वन एवं कृषि-पारिस्थितिकी तंत्रों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तथा भेद्यता का आकलन, अनुकूलन एवं जलवायु लोचशीलता, वन पारिस्थितिकी, सीडीएम और आरईडीडी+ परियोजनाएं आदि पर अपने शोध, पक्षसमर्थन और प्रकाशनों को केंद्रित किया है। उन्होंने जैवऊर्जा, जैवईंधनों और जैवमात्रा उत्पादन, पर्यावरणीय/पारिस्थितिकीय सेवाएं तथा नागरिक विज्ञान के क्षेत्रों में भी कार्य किया है। उनके 150 से अधिक समकक्षों द्वारा समीक्षित शोध पत्र और 8 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन पर आईपीसीसी (जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल) की कई मूल्यांकन रिपोर्टों का भी लेखन किया है। वर्तमान में वह कार्यदल 3 – न्यूनीकरण के लेखक हैं। वे आईपीसीसी संश्लेषण रिपोर्ट 2013 के भी लेखक हैं।

प्रो. रविंद्रनाथ, अनेक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की विशेषज्ञ समितियों के सदस्य हैं।

सारांश
आईपीसीसी ने अप्रैल, 2014 के दौरान ‘ जलवायु परिवर्तन का न्यूनीकरण’ पर कार्यदल 3 रिपोर्ट को अनुमोदित किया। इस प्रस्तुतिकरण का फोकस, रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्षों पर होगा। कार्यदल III ने जलवायु परिवर्तन के न्यूनीकरण के वैज्ञानिक, तकनीकी, पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक पहलुओं पर साहित्य के आकलन के साथ आईपीसीसी की पांचवीं मूल्यांकन रिपोर्ट में योगदान किया है। इस रिपोर्ट ने विविध न्यूनीकरण तरीकों व परिदृश्यों के राजनैतिक व आर्थिक निहितार्थों पर नीतिनिर्माता समुदाय, मीडिया, एनजीओ व कार्पोरेट सेक्टर में काफी रूचि उत्पन्न की है। विश्लेषण किए जाने वाले कुछ प्रश्नों में ये शामिल हैं: क्या हम जलवायु परिवर्तन को < 20C पर स्थिर कर सकते हैं? विभिन्न सेक्टरों व क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन को स्थिर करने के लिए न्यूनीकरण संभावनाएं कौन सी हैं? न्यूनीकरण कार्यवाहियों को बढ़ावा देने के लिए कौन सी नीतियां और उपाय आवश्यक होंगे। विलम्बित कार्यवाहियों के क्या परिणाम होंगे?

इस वार्ता में निम्न मसलों का विशेष रूप से विश्लेषण किया जाएगाः

  • हरितगृह (ग्रीनहाउस) गैसों के प्रवाह व भंडारों व उनके प्रेरकों के रूझान
  • धारणीय विकास के संदर्भ में न्यूनीकरण के तरीके और उपाय
  • जलवायु परिवर्तन को स्थिर करने के लिए दीर्घकालीन न्यूनीकरण तरीके
  • सेक्टरवार और क्रॉस-सेक्टरवार न्यूनीकरण के तरीके और उपाय
  • न्यूनीकरण की नीतियां और संस्थान
  • जलवायु परिवर्तन को < 20C पर स्थिर करने हेतु कार्यवाहियों में विलम्ब के परिणाम

पब्लिक टेक्स्ट्‌
अनवेलिंग

अनवेलिंग के विषय में

अनवेलिंग, एक लगभग प्रसन्न और आधुनिक जोड़े की कहानी है, जिन्होंने अपने घर को नये सिरे से सजाने में काफी मेहनत की। उन्होंने अपने नए सज्जित घर के उद्‌घाटन समारोह में अपने एक मित्र को आमंत्रित किया लेकिन अनायास ही अपने नए घर से कहीं अधिक बढ़कर उजागर कर दिया। अनवेलिंग का यह अनुकूलित रूप, हमारे द्वारा जिए जाने वाले जीवन, जहां हम रहते हैं उन स्थानों, और घालमेल व अनुमोदन की हमारी ज़रूरतों पर आधारित एक प्रखर व्यंग्य है।

चेक नाटककार वाक्लाव हैवेल द्वारा लिखित अनवेलिंग, 3 नाटकों का भाग है जो वानेक त्रयी के लोकप्रिय नाम से जाने जाते हैं। चेकोस्लोवाकिया पर सोवियत शिकंजे के विरूद्ध यह त्रयी, व्यंग्य कृतियों के रूप में 1960 के दशक में लिखी गई थी। इसका अनुकूलन आधुनिक विश्व के अनुरूप किया गया है और बहुत प्रासंगिक सामाजिक व्यंग्य के रूप में इसे पढ़ा जा सकता है।

नोटः यह प्रदर्शन प्रस्तुति 14 वर्ष व अधिक आयु के लोगों के लिए खुली है।

सैंडबॉक्स कलेक्टिव के विषय में

सैंडबॉक्स, बंगलौर स्थित कलाकारों का समूह है जिसमें प्रदर्शन कलाओं का दायरा बढ़ाने के लिए मिलकर कार्य करने वाले कलाकारों और कला प्रशासकों के समूह शामिल हैं। कलेक्टिव का नेतृत्व नीमी रविंद्रन और शिवा पाठक द्वारा किया जाता है, इन दोनों ने रंगमंच में, तथा कला प्रबंधकों के रूप में एक दशक से अधिक समय तक कार्य किया है। उच्च मानक की प्रदर्शन प्रस्तुतियां प्रस्तुत, आयोजित और प्रसारित करना हमारा ध्येय है। हम नए दर्शकों की खोज करते हुए तथा कलाकारों के बीच बहुवैषयिक गठबंधन सुगम बनाते हुए हमारे नगरों में नए सांस्कृतिक जीवंत स्थानों की खोज और उन्हें बनाए रखने की दिशा में भी कार्य करते हैं।


दि रॉस्कल क्विक्सोट

दि रॉस्कल क्विक्सोट के विषय में
ऐसे युग में जहां पागल, मालिक बन गए हैं और सही व गलत के बीच सीमारेखा धुंधली हो गई है, एक लेखक ने एक ऐसे आदमी का कथानक बुना है जो पुस्तकों की दुनिया में रहता है। वह खुद को योद्धा घोषित करके देहातों में विचरण करता हुआ लोगों को आतंकित करने लगता है, लेकिन साथ ही उनका मनोरंजन व मार्गदर्शन भी करता है। दो भोंदू पुलिसिए उसका पीछा करते हैं। रॉस्कल क्विक्सोट की कहानी आगे बढ़ने के साथ लेखक की हताशा झलकने लगती है। क्या योद्वा को कभी प्रेम नहीं मिलेगा? क्या वह कभी न्याय नहीं कर पाएगा? अधिक चिंताजनक रूप से, क्या वह अपना डिनर छोड़ देगा? यह नाटक, सरवांटेस के उपन्यास दि इंजीनियस जेंटलमैन डॉन क्विकजोट ऑफ ला मांचा से प्रेरित है।

हरामी थिएटर
हरामी थिएटर को ऐसे लोगों के समूह के रूप में माना जा सकता है जो थोड़ा बहुत रंगमंच करते हैं, लेकिन इसे अधिक तिक्त संगठन कहना ज्यादा ठीक होगा। यह तब बना जब ‘बटर एंड मैश्ड बनाना’ नाम के एक नाटक को इसे बनाने वाले लोगों के नामकरण की आवश्यकता हुई। तब से हरामी थिएटर ने कुछ नाटक किए हैं।


बंगलौर   |  रूट्‌स एंड बियांड
24 अप्रैल, 2014  |  5.00 बजे अपरान्ह

पब्लिकटेक्स्ट के इस आयोजन में, वास्तुकार तथा INTACH के कन्वेनर सत्य प्रकाश वाराणसी, माया जयपाल से बात करेंगे जो नगरीय इतिहासकार, तथा ओल्ड सिंगापुर (ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस, 1992), ओल्ड जकार्ता (ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस, 1993), बंगलौरः स्टोरी ऑफ दि सिटी (ईस्टवेस्ट बुक्स, 1997) और हाल ही में प्रकाशित बंगलौरः रूट्‌स एंड बियांड (नियोगी बुक्स, 2014) की लेखिका हैं।


पब्लिक @ आईआईएचएस

दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय जलवायु का गतिशील निम्नीकरण
23 जुलाई, 2014 | 4.00-6.00 बजे अपरान्ह
21वीं शताब्दी के प्रत्याशित जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करने के लिए, तथा नीतिनिर्माताओं और पक्षकारों द्वारा जागरूक निर्णय लिए जाने के लिए, इन बदलावों की प्रकृति पर स्थानीय से क्षेत्रीय स्तर की सूचनाएं आवश्यक हैं जिनमें अंतर्निहित प्रक्षेपण अनिश्चितताओं की अच्छी जानकारी शामिल है। हालांकि भारत में ऐसे मूल्यांकन के लिए, क्षेत्रीय पैमानों पर ग्रीष्मकालीन मानसूनी सत्र तथा अन्य जलवैज्ञानिक प्रक्रियाओं की जटिलताएं सुलझाने के लिए आईपीसीसी-आधारित प्रक्षेपों को मौजूदा उत्कृष्ट आधुनिक सर्कुलेशन मॉडलों (जीसीएम) से निम्नीकृत करके उच्च स्थानिक रिजोल्यूशन तक लाने की आवश्यकता है। गतिशील निम्नीकरण पद्धति वैश्विक मॉडल आउटपुट में स्थित उच्च-रिजोल्यूशन वाले क्षेत्रीय जलवायु मॉडलों (आरसीएम) का प्रयोग करती है जिनका ध्येय जीसीएम से प्राप्त स्थूल रिजोल्यूशन वाली सामग्री को क्षेत्रीय और स्थानीय पैमाने वाली दशाओं के अनुरूप रूपांतरित करना होता है। यह तकनीक, लक्षित क्षेत्र पर काफी अधिक स्थानिक रिजोल्यूशन तथा इस प्रकार, महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय विषमताओं (जैसे कि स्थलाकृति, तट रेखाएं, और भूमि सतह विशेषताएं) तथा मध्यस्तरीय वायुमंडलीय प्रक्रमों के अधिक वास्तविक निरूपण को संभव बनाती है। क्षेत्रीय जलवायु प्रक्षेपों की अगली पीढ़ी, डब्ल्यूएमओ के विश्व जलवायु अनुसंधान कार्यक्रम (डब्ल्यूसीआरपी) द्वारा सहसमन्वित क्षेत्रीय जलवायु निम्नीकरण प्रयोग ( CORDEX) की रूपरेखा में पहले ही प्रगति में है। वर्तमान कार्य, CORDEX दक्षिण एशिया घटक में आरसीएम की भागीदारी का मूल्यांकन करता है, जिसे CCCR, IITM द्वारा समन्वित किया गया। यह बहु-मॉडल मूल्यांकन, न केवल भारतीय जलवायु के आधारभूत स्थानिक-तापीय पैटर्नों को प्रदर्शित करने के लिए वर्तमान क्षेत्रीय जलवायु मॉडलों की सामान्य क्षमता रेखांकित करता है, बल्कि चयनित मात्रकों, प्रदेशों व ऋतुओं में उल्लेखनीय विसंगतियां भी इंगित करता है।


जलवायु परिवर्तन प्रभावों, भेद्यता एवं अनुकूलन पर नए निष्कर्ष
नवीनतम IPCC Wg-Ii 2014 रिपोर्ट पर एक चर्चा बैठक

निम्न द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित
इंडियन नेशनल साइंस एकैडेमी, न्यू देलही तथा
दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज, IISc बंगलौर

वृहस्पतिवार, 03 अप्रैल, 2014, 3.30 बजे अपरान्ह
प्रेक्षागृह, दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज, काओस बिल्डिंग, IISc, बंगलौर

लीड्‌स
एन एच रविंद्रनाथ
प्रोफेसर, धारणीय प्रौद्योगिकी केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलौर

पूर्णमिता दास गुप्ता
फोर्ड फाउंडेशन चेयर इन एन्वॉयरनमेंटल इकोनॉमिक्स, इंस्टीट्‌यूट फॉर इकोनॉमिक ग्रोथ, न्यू देलही

अरोमार रेवी
निदेशक, इंडियन इंस्टीट्‌यूट फॉर ह्‌यूमन सेटलमेन्ट्‌स, बंगलौर

प्रारूप
इस लीड में छोटे (लगभग 15-20 मिनट प्रत्येक) प्रस्तुतिकरणों के बाद चर्चाएं और प्रश्नोत्तर (Q&A) होंगे।

पृष्ठभूमि

जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) कार्यदल II (WG-II) रिपोर्ट द्वारा नीतिनिर्माताओं के लिए सारांश (एसपीएम) 29 मार्च, 2014 को निर्गत किया जाना अपेक्षित है। डब्ल्यूजी-II रिपोर्ट, जलवायु परिवर्तन प्रभावों की भेद्यता तथा अनुकूलन का आकलन करती है। विगत सितम्बर में भौतिक विज्ञान पर आधारित डब्ल्यूजी-I रिपोर्ट, जारी की गई थी। ये रिपोर्टें, वर्तमान जलवायु परिवर्तन के आईपीसीसी के पांचवें आकलन का भाग हैं। डब्ल्यूजी-II रिपोर्ट, एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोगात्मक प्रयास का परिणाम है जिसमें 73 देशों के 310 वैज्ञानिक शामिल हैं। इस चर्चा बैठक में इस नई रिपोर्ट में नवीनतम वैज्ञानिक निष्कर्षों पर चर्चा की जाएगी।


धारणीय विकास हेतु संघर्ष में नगरों की क्या भूमिका है?
डेविड सैदरवेट
, वरिष्ठ अध्येता, अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण एवं विकास संस्थान द्वारा आईआईएचएस सार्वजनिक व्याख्यान

27 फरवरी, 2014 / 6 बजे अपरान्ह

सारांश

अपने सार्वजनिक व्याख्यान में, लंदन के डेविड सैदरवेट जो कि अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण एवं विकास संस्थान में वरिष्ठ अध्येता हैं और विश्व के अग्रणी नगरीय विशेषज्ञों में से एक हैं, इस पर बात करेंगे कि विश्व के नगरों के लिए धारणीय विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए क्या करना आवश्यक है। वे मुख्य नगरीय कार्यवृत्तों को रेखांकित करेंगे, जो नगरों को जोखिमों का स्थानीय समाधान करने में सक्षम बनाते हैं, जिनमें महत्त्वपूर्ण क्षेत्र जैसे कि नगरीय निर्धनता, तथा मूलभूत सेवाओं हेतु सार्वभौमिक कवरेज, आपदा जोखिम घटोत्तरी, तथा जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और लोचशीलता सम्मिलित हैं।

डेविड, सरकारों तथा प्रतिनिधि संगठनों और नगरीय निर्धनों के संघों की केंद्रीय भूमिका, नवप्रवर्तकों के मुख्य निष्कर्षों, तथा यह रेखांकित करेंगे कि उनको प्रभावी बनाने के लिए क्या करना चाहिए, तथा विश्व भर के नगरों के उदाहरणों सहित एक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली की आवश्यकता जो स्थानीय प्रेरित धारणीय विकास को समर्थित करने पर अधिक ध्यान दे।


अरूण जैन तथा डॉ. अलेक्जेंडर श्मिडिट द्वारा सार्वजनिक सेमिनार
इस सेमिनार को दो वक्ताओं, अरूण जैन अरूण जैन, नगरीय डिजाइनर तथा रणनीतिकार, (http://urbdesign.wordpress.com/) तथा डॉ. अलेक्जेंडर श्मिडिट, डुइसबर्ग-एसेन विश्वविद्यालय में ARUS (नगरीय प्रणालियों में उन्नत अनुसंधान) के सह-निदेशक (https://www.uni-due.de/zlv/portrait/schmidt.php). द्वारा आयोजित किया गया। सेमिनार का आयोजन बंगलौर सिटी कैम्पस में 23 जनवरी, 2014 को 11:00 AM – 1:30 PM तक किया गया।

प्रस्तुतिकरण के विषयः

  • नगरीय विकास में उभरते मसले तथा संभावनाएं
  • UDE’s ARUS (नगरीय प्रणालियों में उन्नत अनुसंधान) की अंतर/पार-वैषयिक अनुसंधान प्रविधि
फिल्म प्रदर्शन
कॉटन फॉर माय श्राउड

9 जुलाई, 2014  |  6.30pm

सारांश

1995 से एक चौथाई मिलियन भारतीय किसान आत्महत्या कर चुके हैं-जो कि मानवीय इतिहास में दर्ज की गई आत्महत्याओं की सबसे बड़ी लहर है। उनमें से अधिकांश, महाराष्ट्र में विदर्भ क्षेत्र के कपास के किसान थे। इस क्षेत्र के गांवों से गुजरने के लिए आपको अपने हृदय पर पत्थर रखना होगा। कभी अपने उत्कृष्ट कपास के लिए विख्यात यह क्षेत्र ‘किसानों की कब्रगाह’ कहा जाने लगा है।

‘कॉटन फॉर माय श्राउड’ में जमीनी दृष्टिकोण से इसकी पड़ताल करने का प्रयास किया गया है कि भारत में कपास के किसानों को कौन चीज हताश करती है-क्या यह केवल खेती का कर्ज है या वे विकास के दोषपूर्ण आयाम के शिकार हैं। किसानों और वैज्ञानिकों के उद्धरण, भारत सरकार की सतही नीतियों और बहुराष्ट्रीय निगमों से दुरभिसंधियों को उजागर करते हैं। राज्य की छत्रछाया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा, फसलों की प्रचारित ‘बेहतर ट्रांसजेनिक किस्मों’ की आक्रामक मार्केटिंग ने निर्धन किसानों को लुभाते हुए, उनकी कम लागत वाली उनकी धारणीय कृषि की पारंपरिक बुद्धिमत्ता का त्याग करने पर उन्हें विवश किया, और किसान अंततः बीटी के लुभावने जाल में फंस गए। भारतीय राज्य ने जो दशाएं निर्मित कीं वे छोटे किसानों को जीवित रखने के अनुकूल नहीं हैं। राज्य उन्हें खत्म करने पर तुला है, जिस तरह पश्चिम में छोटे किसान गायब होते जा रहे हैं।

‘कॉटन फॉर माय श्राउड’ को विदर्भ के आंतरिक भागों में दो विजिट के दौरान फिल्माया गया। फिल्मकारों के दृष्टिकोण से प्रथम पुरूष में वर्णित यह फिल्म, तीन परिवारों के जीवन वृत्तांत का अनुसरण करते हुए वृहद परिदृश्य की पड़ताल करती है।

निर्देशकों के विषय में

नंदन सक्सेना और कविता बहल ने वृत्तचित्रों व काव्य फिल्मों की शैलियों पर कार्य किया है। उनका कार्य पारिस्थितिकी, आजीविकाएं, विकास एवं मानवाधिकार के क्षेत्रों तक व्यापक है। दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक करने के उपरांत उन्होंने पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। इसके पश्चात, कविता ने सात वर्षों तक दि इंडियन एक्सप्रेस में और नंदन ने दृश्य-श्रृव्य मीडिया में कार्य करते हुए समाचारों और सामयिक मामलों की प्रोग्रामिंग की, जिसे वे अपने अतीत जीवन का अंग मानते हैं।

1996 में स्वतंत्र फिल्मनिर्माताओं के रूप में उन्होंने कुछ नया करने की ठानी। उनकी फिल्में, अनेक वीथियों-सांस्कृतिक, राजनैतिक और मानवशास्त्रीय-वानस्पतिक के माध्यम से मनुष्य के उसके पर्यावरण से संबंध का अन्वेषण करती हैं। उनकी स्वयंसेवी पहल ‘वाया-मीडिया’, रूचि रखने वाले लोगों तक सकारात्मक कहानियां पहुंचाते हुए परिवर्तन को प्रेरित करने, और नागरिक समूहों व आंदोलनों की क्षमता संवर्धित करने के लिए एक प्रयास है। जिज्ञासु सोच प्रेरित करने के लिए उन्होंने फिल्म-निर्माण तथा फोटोग्राफी की कार्यशालाएं कीं। वे संस्कृति एवं मीडिया अध्ययन विभाग, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में अतिथि संकाय हैं।

नंदन एक प्रखर फोटोग्राफर भी हैं। 2009 में उन्होंने अपने फोटोग्राफ्स की 30 दिवसीय एकल प्रदर्शनी इंडिया हैबिटेट सेंटर, नयी दिल्ली में लगाई। दिसम्बर 2011 में वेटवरन फिल्म समारोह के दौरान कैनन और एम्ब्रेस वीडियो के साथ साझेदारी में उन्होंने डीएसएलआर-फिल्म निर्माण पर एक कार्यशाला आयोजित की, और फरवरी, 2012 में मुम्बई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह (MIFF-2012) के दौरान डीएसएलआर-फिल्म निर्माण पर एक अन्य कार्यशाला का आयोजन किया।


हद अनहद

हद अनहदः राम और कबीर के साथ यात्रा
कबीर, उत्तर भारत में 15वीं शताब्दी के संत कवि थे, जिन्होंने हिंदू और मुस्लिम के बीच सीमाओं को अस्वीकृत कर दिया। उनका नामकरण और पालन-पोषण मुस्लिम रीति से हुआ, लेकिन उनके काव्य में ईश्वर के हिंदू नाम-राम का बार-बार उल्लेख आया है। कबीर का राम कौन है? गीतों और कविताओं के माध्यम से यह फिल्म, धर्म की राजनीति में विचरण करते हुए भारत व पाकिस्तान के बीच शत्रुतापूर्ण सीमा के दोनों ओर से असंख्य उत्तर खोजती है।

शबनम विरमानी के विषय में

शबनम बंगलौर, भारत में सृष्टि स्कूल ऑफ ऑर्ट, डिजाइन एंड टेक्नोलॉजी में फिल्मकार और कलाकार हैं। 2003 में उन्होंने मालवा, राजस्थान के लोक गायकों के साथ यात्रा शुरू की और हमारी समकालीन दुनिया में 15वीं शताब्दी के रहस्यमयी कवि कबीर के आध्यात्मिक एवं सामाजिक-राजनैतिक अनुनाद की खोज में पाकिस्तान भी गईं। इन यात्राओं के परिणाम 4 संगीतमय वृत्तचित्रों की एक श्रृंखला, अनेक संगीत सीडी, तथा अनुवादित काव्य पुस्तकों के रूप में साकार हुए। वर्तमान में वे कबीर तथा अन्य रहस्यवादी, सूफी और भक्ति कवियों की कृतियों व संगीत की वेब-आर्काइव तैयार कर रही हैं। उनकी यात्रा जारी है और वे न केवल कबीर से, बल्कि इस उपमहाद्वीप के अन्य रहस्यवादी कवियों, तथा हमें उनसे परिचित कराने वाली मौखिक लोक परंपराओं से प्रेरित हैं। (www.kabirproject.org)

उनके आरंभिक कार्य में कई वीडियो और रेडियो कार्यक्रम शामिल हैं जो भारत में जमीनी स्तर की स्त्रियों के समूहों से घनिष्ठ साझेदारी के आधार पर तैयार किए गए। उन्होंने भारत में जमीनी स्तर की स्त्रियों के समूहों से घनिष्ठ साझेदारी के आधार पर तैयार कई पुरस्कृत वृत्तचित्रों तथा रेडियो कार्यक्रमों का निर्देशन किया है। 1990 में, उन्होंने अहमदाबाद में दृष्टि मीडिया, कला एवं मानवाधिकार समूह की स्थापना की।

कबीर परियोजना पर उनके कार्य हेतु हाल ही में

उन्हें देश में सांप्रदायिक सद्‌भाव तथा अंतर-पंथ समझ में योगदान करने हेतु दिसम्बर 2013 में क्रिस्टी हार्मनी अवार्ड प्रदान किया गया। लोक संगीत की समावेशी प्रेरणा से प्रेरित शबनम ने स्वयं 5 तारों वाला तम्बूरा बजाना सीखा और अब कबीर व अन्य रहस्यवादी कवियों के विविध लोक काव्य गाती हैं।


बॉटल मसाला इन मॉइल
निर्देशकः वैदेही चित्रे
प्रदर्शन 21 मई, 2014 को 6.00 बजे अपरान्ह आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस में

मुम्बई की स्थानीय जनसंख्याओं के वंशज ईस्ट इंडियन समुदाय, विविध स्थानीय समूहों जैसे कि किसानों, मछुआरों, ताड़ी बनाने वालों, सॉल्ट पैन श्रमिकों और अन्य से उत्पन्न हुए। उनमें से अनेक ऐसी भूमि पर श्रम करने वाले खेतिहर थे जिसका स्वामित्व भी उनका था।

आज, तीव्र गति से विकसित होते एक नगर में विरासती संपत्ति के मालिकों के रूप में इस समुदाय की भूमि तेजी से सरकार तथा कंपनियों द्वारा छीनी जा रही हैं। समग्र समुदाय के लिए इसका अर्थ उस मिट्‌टी से एक मूल्यवान रिश्ता टूट जाने से है, जिससे उनकी संस्कृति जुड़ी हुई है-‘हमारी कहानी’। लेकिन अनेक के लिए, विशेषकर जो ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, इसका अर्थ आजीविका पर संकट से भी है, और परिणामस्वरूप छोटे समुदाय के रूप में यह उनके अस्तित्व का संकट है।

‘बॉटल मसाला इन मॉइल’ का फोकस इनमें से कुछ कहानियों पर है। यह फिल्म दो अलग-अलग अध्यायों में बंटी है जो विषयवस्तु के आधार पर पृथक लेकिन नाटकीय रूप से एकीकृत हैं। मुख्यभूमि मुम्बई पर आधारित ‘बेली ऑफ दि व्हेल’, खोने के अनुभव के साझे धागे में शिथिलता से बंधी व्यक्तिगत कहानियों का संग्रह है। ‘आई ऑफ दि स्टॉर्म’ धारावी द्वीप पर आधारित है और इसमें भूमि अधिग्रहण के विरूद्ध समुदाय के प्रतिरोधक आंदोलन का वर्णन किया गया है।


सरवाइविंग प्रोग्रेस
निर्देशकः मैथ्यू रॉय और हेरॉल्ड क्रुक्स
प्रदर्शन 25 अप्रैल, 2014 को 6.00 बजे अपरान्ह आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस में

‘सरवाइविंग प्रोग्रेस’ अत्यन्त प्रेरक और दोहरे पहुलओं वाली मानवीय उन्नति की कहानी प्रस्तुत करती है। यह 21वीं शताब्दी के सॉफ्टवेयर-हमारे ज्ञान-को हमारे आदिम मस्तिष्क के प्राचीन हार्डवेयर पर, जिसे 50,000 वर्षों में उन्नत नहीं किया गया है, चलाने का विकट जोखिम उजागर करती है। भरपूर कल्पनाशीलता तथा मनमोहक साउंडट्रैक के साथ फिल्मनिर्माता मैथ्यू रॉय और हेरॉल्ड क्रुक्स हमें गुफाओं में रहने वाले आदिमानवों से लेकर अंतरिक्ष खोजी तक की हमारी यात्रा पर ले जाते हैं।

सरवाइविंग प्रोग्रेस हमें उन विचारकों से रूबरू कराती है जिन्होंने हमारे आदिम अतीत, हमारे मस्तिष्कों और हमारे समाजों की पड़ताल की। कुछ राइट की तात्कालिक चेतावनी को आवर्धित करते हैं, जबकि अन्य यह विश्वास जाहिर करते हैं कि हमें उलझन में डालने वाली प्रगति ही हमारे निर्वाण की भी कुंजी है। अंतरिक्ष विज्ञानी स्टीफन हॉकिन्स अन्य ग्रहों पर घरों की खोज में हैं। जैवशास्त्री क्रेग वेन्टर, जिनकी टीम ने मानवीय जीनोम को डिकोड किया, ऐसे संश्लेषित सूक्ष्मजीव डिजाइन कर रहे हैं जिनके बारे में उनको उम्मीद है कि वे सभी के लिए कृत्रिम खाद्य और ईंधन निर्मित करेंगे।


स्टिर. फ्राई. शिमर

निर्देशकः वाणी सुब्रमण्यन
प्रदर्शन 21 मार्च, 2014 को 6.00 बजे अपरान्ह आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस में

सारांश

समाचारपत्रों में, समाचार चैनलों पर और बाज़ार में रोज जाने के दौरान हम खाने-पीने की चीजों की लगातार बढ़ती कीमतों, राज्य द्वारा खाद्य की बड़ी बर्बादी, खाद्य सुरक्षा पर समझौता करने वाली नीतियों, तथा खाद्य को लेकर अन्य ऐसी ही विफलताओं और खामियों से रूबरू होते हैं। फिर भी, उन्हीं चैनलों या समाचारपत्रों में हम इस बारे में भी असंख्य प्रस्तुतियां पा सकते हैं कि भोजन एक कला है, अधिक खाना, डायटिंग को लेकर बहसें, यात्राा के दौरान खान-पान, तथा यहां तक कि खाना पकाना भी सफल भविष्य का एक मार्ग है।

इन सबके दरम्यान, न तो पूरी तरह इन सब सच्चाईयों से जुदा, और न ही इनसे पूरी तरह से बंधा हुआ-हमारा अपना किचन है। ऐसा स्थान, जहां नियमित खाना पकाने के बाद समान मात्राओं में प्रायः प्रेम परोसा जाता है। ऐसा स्थान, जहां उपाख्यान सुने और अनुभव जिए जाते हैं, हमारे खाने का यादगार स्वाद, और हम इसे खाना कैसे याद रखते हैं। ऐसा स्थान, जहां हमारी स्वाद कलिकाएं, विकसित होना शुरू होती हैं। निस्संदेह हमारे किचन ऐसे स्थान भी हैं जहां यह सीखते हैं कि कौन से भोजन और विधियां हमारे नहीं हैं, खाद्य को अखाद्य से पृथक करना, वांछित को अवांछित से, अत्यन्त स्वीकार्य को अस्वीकार्य से पृथक करना सीखते हैं।

इन संवेदी क्षमताओं को बाहरी विश्व तक ले जाते हुए, हम सोचते हैं कि खाद्य के लिए हमारी प्रतिक्रियाएं ‘नैसर्गिक’ हैं, लेकिन क्या वाकई ऐसा है? मेरी प्लेट कहां पर खत्म और आपकी कहां से शुरू होती है? क्या हम वही हैं जो हम खाते हैं, या वास्तव में, हम जो हैं, वही हम खाते हैं?

ये कुछ रोचक (और कुछ अरूचिकर) सवाल हैं जो वाणी सुब्रमण्यन की फिल्म स्टिर. फ्राई. शिमर आपके सामने रखती है, क्योंकि इसमें भोजन, स्मृति, अतीतप्रेम, अपनत्व, परिवार, समुदाय, राष्ट्र, पराएपन, आकांक्षा और घृणा, राजनीति, पूर्वाग्रहों, और शक्ति के तत्वों को पिरोया गया है।


निर्णय
निर्देशकः पुष्पा रावत

प्रदर्शन 26 फरवरी, 2014 को 6.00 बजे अपरान्ह, आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस में

सारांश
यह फिल्म, पुष्पा का व्यक्तिगत वृत्तांत है जिसमें उन्होंने अपने स्वयं के तथा अपने महिला मित्रों के जीवन को सार्थक रूप देने का प्रयास किया है। दिल्ली के बाहरी इलाके में निम्न-मध्यवर्गीय परिवेश पर आधारित यह फिल्म, महिलाओं के जीवन की पड़ताल करती है जो युवा, शिक्षित और प्रखर हैं, लेकिन जो अपने जीवन के किसी भी बड़े फैसले को लेकर, चाहे वह कैरियर से जुड़ा हो या शादी से, खुद को विवश और असहाय महसूस करती हैं। तीन वर्षों के समयकाल में महिलाओं के जीवन का विश्लेषण करते हुए यह फिल्म उनके जीवन में आए बदलावों को दर्ज करती है और उनके अस्तित्व की सार्थकता को समेटने का प्रयास करती है, कभी बातचीत के द्वारा, तो कभी केवल उनकी नितांत साधारण प्रतीत होने वाली दैनिक दिनचर्या का अवलोकन करते हुए।


वीडियोकरण
निर्देशकः जगन्नाथन कृष्णन

प्रदर्शन 26 फरवरी, 2014 को 6.00 बजे अपरान्ह, आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस में

सारांश
सिनेमा आपको आपका जीवन बेहतर बनाने में मदद कर सकता है, फिल्मी सितारे आपका मनोबल बढ़ा सकते हैं, और आपको आध्यात्मिक संदेश दे सकते हैं जो आपको ऊंचा उठा सकते हैं। सगाई का यही विश्वास है। सगाई, फिल्म प्रेमी है और दक्षिण भारतीय सुपरस्टार रजनीकांत उसका आदर्श है। वह मुम्बई की मलिन बस्ती में अर्ध-वैध वीडियो पार्लर में फिल्में देखता हुआ बड़ा हुआ है। बड़े होने पर उसने अपने पिता की तरह उसी स्थान पर कार्य करना शुरू किया। वीडियो थिएटर अब नहीं रहा। आकर्षक, वाक्‌पटु और प्रायः राजनैतिक रूप से गलत अनौपचारिक बातचीत में वह अपने वीडियो थिएटर की कहानी फिल्मों के अपने वर्णन के साथ साझा करता है।

2013

सम्मेलन

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र तथा इंडियन इंस्टीट्‌यूट फॉर ह्‌यूमन सेटलमेन्ट्‌स, बंगलौर ने भारत में नगरीकरण पर : ’21वीं शताब्दी के भारतीय नगरः कस्बे, महानगर, और भारतीय अर्थव्यवस्था’ विषय पर आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस में एक दो-दिवसीय सम्मेलन का आयोजन 26 और 27 मार्च, 2013 को किया गया।

भारत के आर्थिक विकास में ‘नगरीय’ अर्थव्यवस्था की भूमिका, दिनोंदिन अधिक महत्त्वपूर्ण होती जा रही है। भारतीय कस्बों, नगरों और महानगरों की अर्थव्यवस्था की प्रभावी व समानतापूर्ण कार्यप्रणाली से संबंधित अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर पड़ताल के लिए इस कार्यशाला/सम्मेलन का आयोजन किया गया। हमें रियल एस्टेट बाज़ारों, एकत्रित अर्थव्यवस्थाओं, नगरीकरण के नए स्वरूपों, तथा नगरीय प्रशासन की संरचनागत समस्याओं पर विश्लेषण अपेक्षित है। चर्चाओं का फोकस, विकसित नगरीय अवसंरचना, रोजगार सृजन में वृद्धि, किफायती आवासों तक अधिक पहुंच, प्रशासन की पारदर्शी प्रणालियों का विकास, नगरीय वित्त के नए स्रोतों को उत्पन्न करने, तथा नगरीय निर्धनों के लिए व्यावहारिक सामाजिक कल्याण प्रणालियां तैयार करने के लिए ठोस नीतियों को बढ़ावा देने में मदद वाले तरीकों पर होगा।


पब्लिक @ आईआईएचएस

चीजों की समग्र प्रकृतिः लता मणि
इस पब्लिकटेक्स्ट आयोजन में, अम्लानज्योति गोस्वामी, लता मणि से चर्चा करेंगे जो लेखिका, नारीवादी इतिहासकार तथा अपनी नई पुस्तक दि इंटेग्रल नेचर ऑफ थिंग्स की सांस्कृतिक समालोचक हैं।
आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस, 12 दिसम्बर, 7.00 बजे अपरान्ह


रैडिकल पारिस्थितिक लोकतंत्रः धारणीयता और समानता की ओर
आशीष कोठारी द्वारा वार्ता
भारत में ‘वैश्वीकरण’ के विगत दो दशकों में देखी गई उल्लेखनीय वृद्धि, भक्षक प्रकृति की है और हाशिए पर के लोगों को समाप्त करती है। पारिस्थितिक अस्थायित्व और बढ़ती असमानताओं के स्पष्ट संकेत हैं। सामाजिक-पारिस्थितिक अव्यवस्था की ओर तीव्र झुकाव को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है। वर्तमान नीतियों और प्रविधियों के ठोस विकल्पों, तथा रैडिकल पारिस्थितिक लोकतंत्र की ओर आधारभूत राजनैतिक सुधारों की आवश्यकता है। इस वार्ता में आशीष कोठारी ने जमीनी स्तर के आंदोलनों व प्रयासों से उत्पन्न होने वाले सबक लेते हुए धारणीयता हेतु एक रूपरेखा वर्णित की है।
आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस, मंगलवार, 26 नवम्बर, 6.30 बजे अपरान्ह


शुरूआती पब्लिकटेक्स्ट्‌ कार्यक्रम में मारियो डि’पेन्हा, इतिहासकार एवं कार्यकर्ता, तथा ‘बिकॉज आई हैव ए वॉयसः क्वीयर पॉलिटिक्स इन इंडिया’ (योदा प्रेस) के सह-संपादक गौतम भान और अरविंद नरायन की भागीदारी है।
आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस, शुक्रवार, 11 अक्टूबर, 6.30 बजे अपरान्ह
अधिक जानकारी


‘कॉमिक्स और नगरीय कल्पनाशीलता’ पर लॉरेंस लियांग की वार्ता
आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस, वृहस्पतिवार, 12 सितम्बर, 5.30 बजे अपरान्ह


आईआईएचएस ने ‘कैलिफोनिर्या के परिवहन तथा जलवायु नीति में वर्तमान प्रगति’विषय पर डॉ. मैथ्यू जॉन हौलिएन द्वारा सार्वजनिक चर्चा का आयोजन मंगलवार, 08 जनवरी, 2013 को 5.30 बजे आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस में किया। 


फिल्म प्रदर्शन

क्या हुआ इस शहर को
निर्देशकः दीपा धनराज

प्रदर्शन 20 नवम्बर, 2013 को 5.00 बजे अपरान्ह आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस में। फिल्म के प्रदर्शन के पश्चात फिल्मनिर्माता, चर्चा हेतु उपस्थित होंगे।

सारांश
क्या हुआ इस शहर को? को ‘लिविंग आर्काइव’ परियोजना के भाग के रूप में 27 वर्षों में पहली बार डिजिटलीकृत, पुनःस्थापित और फिर से प्रदर्शित किया गया है। अतिरिक्त ऐतिहासिक और समकालीन सामग्री के साथ एक डीवीडी, जून, 2013 में जारी की गई।

निर्देशक के विषय में
दीपा धनराज, बंगलौर, दक्षिण भारत निवासी लेखिका, निर्देशक और निर्माता हैं। उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन किया। उन्होंने कई पुरस्कृत वृत्तचित्रों का निर्माण और निर्देशन किया है। ‘समथिंग लाइक ए वार’ (चैनल 4); ‘दि लीजेसी ऑफ माल्थस’ (बीबीसी 2); ‘सुदेश’ (फॉस्टफिल्म/एआरडी), ‘नारी अदालत/वूमेन्स कोर्ट’ और ‘व्हॉट हैज हैपेन्ड टू दिस सिटी?’। फिल्मों को एआरटीई, सीबीसी और एसबीएस पर प्रदर्शित किया गया है। उनकी फिल्मों को आईडीएफए, बर्लिनेल, लेपजिग, ओबरहॉसन, और फिल्म्स डे फेम्स, क्रेटेल फ्रांस, टेम्पेर, वैंकूवर तथा शिकागो में समारोहों में आमंत्रित किया गया है। शिक्षा में उनकी विशेष रूचि है और उन्होंने प्रथम पीढ़ी के विद्यार्थियों द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों के समाधान के लिए विशेष वीडियो सामग्रियां निर्मित की हैं।


बिदेसिया इन बम्बई
(निर्देशकः सुरभि शर्मा)

भोजपुरी संगीत, जिसे प्रवासी लोग अपने पीछे छूट गए घर से जुड़े रहने के लिए तथा अपने नए घर के रूप में इस नगर में अपनी उपस्थिति सशक्त बनाने के लिए निर्मित, प्रस्तुत और वितरित करते हैं, पर एक नई तरह की फिल्म बिदेसिया इन बम्बई (निर्देशिकाः सुरभि शर्मा) का आईआईएचएस ने प्रदर्शन किया,

आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस, समयअवधिः 86 मिनट


आईआईएचएस ने स्वाति दांडेकर की फिल्म ‘वॉटर एंड ए सिटी’ का 16 जनवरी, 2013 को आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस में प्रदर्शन आयोजित किया।

2012

7 दिसम्बर, 2012
आईआईएचएस ने ‘इमारतों के बीच जिंदगीःएफएसआई का उपयोग और दुरूपयोग’ विषय पर शिरीष पटेल द्वारा आईआईएचएस बंगलौर सिटी कैम्पस में 9.45-10.45 बजे पूर्वान्ह तक वार्ता का आयोजन किया।

30 नवम्बर, 2012
कविता वानखेड़े, शशिकला गौड़ा, और सोमनाथ सेन ने सेव दि वेस्टर्न घाट्‌स प्रैक्टिशनर्स कॉन्क्लेव 2012 में ‘पश्चिमी घाट तथा नगर’ विषय पर पैनल चर्चा में भाग लिया।

24 नवम्बर, 2012
आईएचएस ट्रस्ट ने टीआईई बंगलौर के साथ इंडियन इंस्टीट्‌यूट फॉर ह्‌यूमन सेटलमेन्ट्‌स, बंगलौर सिटी कैम्पस, सदाशिवनगर में ‘नगरों की धारणीय वृद्धि श्रृंखला, भाग 1: उद्यमिता के माध्यम से अपशिष्ट प्रबंधन का नवोन्मेष’ का आयोजन किया।

18 अक्टूबर- 19 नवम्बर, 2012
अरोमार रेवी ने शांग्री-ला-इरोज होटल, नयी दिल्ली में ‘औद्योगिक संवृद्धि एवं नगरीकरण हेतु रियल एस्टेट रणनीतियां’ पर 5वें GIREM लीडरशिप सम्मेलन में नीतिगत मंदी तथा रियल एस्टेट और नगरीकरण पर इसके प्रभावों पर समापन पैनल चर्चा में भाग लिया।

05 सितम्बर, 2012
दि एसोसिएशन ऑफ अफ्रीकन प्लॉनिंग स्कूल्स ने आईआईएचएस और यूएफबीएसी के साथ ब्राजील में ‘वैश्विक दक्षिण में ज्ञान का उत्पादन’ पर नेटवर्किंग कार्यक्रम का आयोजन किया।

30 अगस्त – 01 सितम्बर, 2012
औरोविले ग्रीन प्रैक्टिसेज, औरोविले द्वारा आयोजित एनर्जी पॉजिटिव हैबिटेट्‌स कार्यशाला में अरोमार रेवी द्वारा ‘ऊर्जा अनुकूल वासस्थल (एनर्जी पॉजिटिव हैबिटेट्‌स)-भविष्य’ पर मुख्य समापन सम्बोधन।

जुलाई, 2012
अरोमार रेवी ने टीआईई बंगलौर में ओपेन हाउसः मैककिंजी रिपोर्ट ऑन ‘इंडिया’ज अर्बन अवेकनिंग’- ट्रेंडस्पॉटिंग फॉर एंटरप्रेन्योर्स पर एक वार्ता प्रस्तुत की।

27-29 अप्रैल, 2012
अम्लानज्योति गोस्वामी ने येल विश्वविद्यालय, न्यू हैवेन, सीटी में ‘भूमि एवं कानून’ पर पैनल में आधुनिक भारत में भूमि से संबंधित नए प्रश्न पर एक सम्मेलन में भाग लिया।

अप्रैल, 2012
अम्लानज्योति गोस्वामी ने एमआईटी, डीयूएसपी, कैम्ब्रिज, एमए में ‘भूमि अधिग्रहणः कानून और राजनीति’ पर एक वार्ता प्रस्तुत की।

16 अप्रैल, 2012
प्रशांत धवन ने आज के परिवर्तनशील नगरीय परिदृश्य में परिसर (कैम्पस) वातावरण का प्रयोजन निर्धारित करने के लिए स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर, आरवीसीई में ‘परिसरों (कैम्पस) की पुनर्कल्पना’ पर एक वार्ता प्रस्तुत की।

2011

10 दिसम्बर 2011
आईआईएचएस ने सस्टेनेबल अर्बनिज्म इंटरनेशनल की साझेदारी में ‘धारणीय नगरों का भविष्य-विरासत, संस्कृति एवं पर्यावरण’ विषय पर बंगलौर में एक सेमिनार का आयोजन किया।

9 दिसम्बर, 2011
डॉ. एच एस सुधीर ने IISc बंगलौर में ‘भारत में स्मार्ट नगरों की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां’ पर एक संगोष्ठी में व्याख्यान प्रस्तुत किया।

21-23 अक्टूबर, 2011
आईआईएचएस ने इंडिया वॉटर पोर्टल के साथ मिलकर विश्व बैंक की एक पहल, वॉटर हैकाथॅन-बंगलौर का आयोजन किया।

28 जून, 2011
नवप्रवर्तन, धारणीयता और विकास पर NISTADS अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार, नयी दिल्ली में, भारत में नवप्रवर्तन पर वैचारिक स्थिति पर अरोमार रेवी द्वारा महत्त्वपूर्ण चिंतन. वीडियो यहां देखें

24 जून, 2011
डॉ. गौतम भान ने टीआईएसएस में ‘दि ज्यूरीडिकलाइजेशन ऑफ पॉलिटिक्सःथिंकिंग थ्रो एविक्शंस इन मिलेनियल दिल्ली’ पर एक सेमिनार का आयोजन किया।

7 जून, 2011
आईआईएचएस द्वारा ‘भारत में समावेशी नगर’ विषय पर सेवा, आईआईएचएस, विश्व बैंक और डीएफआईडी, यूके के संयुक्त तत्वाधान में कार्यशाला का आयोजन

5 मई, 2011
डॉ. गौतम भान ने यूसीएल, लंदन में ‘बलात बेदखली और मानव अधिकार‘ विषय पर एक चर्चा को सुगम बनाया।

29 अप्रैल, 2011
अरोमार रेवी ने नगरीय भारत सम्मेलन, येल विश्वविद्यालय में भागीदारी की।

30 मार्च-01 अप्रैल, 2011
अरोमार रेवी ने यूएनईपी/स्टेलेनबॉश विश्वविद्यालय नगरीय अवसंरचना रूपातरण एवं अभिशासन कार्यशाला, स्टलेनबॉश में भाग लिया।
28 मार्च-30 मार्च, 2011
अरोमार रेवी ने अफ्रीकन सेंटर फॉर सिटीज/केपटाउन विश्वविद्यालय आईएसबीए नगरीय अनुसंधान कार्यशाला केप टाउन में भागीदारी की।
25 मार्च, 2011
अरोमार रेवी ने आईआईसी दिल्ली में ’21वीं शताब्दी के भारतीय शहरः भारत में नगरीकरण हेतु एजेंडे का निर्धारण’ पर प्रस्तुति दी।
22 मार्च-24 मार्च, 2011
अरोमार रेवी ने मानव बस्तियां, अवसंरचना एवं स्थानिक नियोजन, पर आईपीसीसी विशेषज्ञ समूह बैठक कोलकाता में भाग लिया।
9 मार्च, 2011
अरोमार रेवी ने ‘भारत के नगरीय रूपांतरण : चुनौतियों का संभावनाओं में बदलना’ विषय पर वर्ल्ड फ्यूचर काउंसिल, पुनरूद्धारक नगरीकरण पर कार्यशाला, आईएचसी, नयी दिल्ली में एक प्रस्तुतिकरण दिया।
24 फरवरी – 25 फरवरी, 2011
अरोमार रेवी ने जोखिम वैश्विक मूल्यांकन रिपोर्ट 2011 की INISDR परामर्शी बोर्ड समीक्षा, जेनेवा में भाग लिया।
2 फरवरी, 2011
अरोमार रेवी ने सीएसडीएस तथा आईडीएस नगर एवं पर्यावरण कार्यशाला, भारत में जलवायु परिवर्तन, आईआईसी, दिल्ली में एक प्रस्तुतिकरण दिया।
27 जनवरी, 2011
अरोमार रेवी ने TIFAC/IIASA/CEPT जलवायु परिवर्तन तथा ग्रीनहाउस गैस न्यूनीकरण कार्यशाला- जलवायु परिवर्तनः भारतीय नगरों के लिए अनुकूलन तथा न्यूनीकरण का एजेंडा, सीईपीटी में भाग लिया।
11 जनवरी – 14 जनवरी, 2011
अरोमार रेवी ने आईपीसीसी मूल्यांकन रिपोर्ट 5 (AR5) फर्स्ट लीड ऑथर्स मीटिंग त्सुकुबा में भाग लिया।

2010

23 अक्टूबर, 2010
अरोमार रेवी ने उभरता नगरीय भारत तथा अनौपचारिक नगर, 361 डिग्री कॉन्फ्रेन्स, डिजाइन एंड मुम्बई में एक प्रस्तुतिकरण दिया।
15 अक्टूबर, 2010
अरोमार रेवी ने जलवायु परिवर्तनः भारतीय नगरों हेतु अनुकूलन एवं न्यूनीकरण का एक एजेंडा, यूजीईसी, एरिजोना राज्य विश्वविद्यालय, टेम्पे में एक महत्त्वपूर्ण सम्बोधन प्रस्तुत किया।
12 अक्टूबर, 2010
अरोमार रेवी ने चुनौतियों से अवसरों तक भारत का नगरीय रूपांतरण विषय पर जीएसडी हॉवर्ड में एक व्याख्यान दिया।
11 अक्टूबर, 2010
अरोमार रेवी ने, चुनौतियों से अवसरों तक भारत का नगरीय रूपांतरण, पर कोरबेल स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स, डेनवर विश्वविद्यालय में एक व्याख्यान प्रस्तुत किया।
9 अक्टूबर, 2010
अरोमार रेवी ने दि इंडियन इंस्टीटय़ूट फॉर हय़ूमन सेटलमेन्ट़स एशिया के नए वैश्विक विश्वविद्यालय, अमेरिकन कॉलेजिएट स्कूल्स ऑफ प्लॉनिंग (ACSP) कॉन्फ्रेन्स मिनेपोलिस में एक व्याख्यान दिया।
5-8 अक्टूबर, 2010
अरोमार रेवी ने ‘भारत का नगरीय रूपांतरण तथा भारतीय मानव बस्ती संस्थान‘ पर एसोसिएशन ऑफ अफ्रीकन प्लॉनिंग स्कूल्स (AAPS) दार एस सलाम में महत्त्वपूर्ण सम्बोधन प्रस्तुत किया
9 सितम्बर, 2010
अरोमार रेवी ने धारणीयता, विरासत एवं नगरीय विकासः भारत में मसले एवं चुनौतियां, पर विरासत आधारित धारणीय विकास UNESCO-IHN कार्यशाला, नयी दिल्ली में भाग लिया।
14 जुलाई, 2010
अरोमार रेवी ने IIM बंगलौर में ‘तीव्र नगरीय वृद्धि की चुनौतियां : नगरीय वृहद केंद्रों में महत्त्वपूर्ण अवसंरचना संस्थानों की तैयारी’ विषय पर गोलमेज चर्चा में भाग लिया।
23 जून, 2010
मिहिर शाह (भारतीय योजना आयोग) ने ‘बारहवीं भारतीय पंचवर्षीय योजना (2012-2017) की संस्थागत चुनौतियां’ : लंदन में भविष्य हेतु जल नियोजन उदाहरण पर प्रस्तुतिकरण दिया।
10 मई, 2010
अरोमार रेवी ने ‘भारत का नगरीय रूपांतरणः चुनौतियों से अवसरों तक’ पर केप टाउन में एक व्याख्यान दिया।

2009

18 नवम्बर, 2009
अरोमार रेवी (आईआईएचएस) द्वारा लंदन में चुनौतियों से अवसरों तक भारत का नगरीय रूपांतरण
12 नवम्बर, 2009
अरोमार रेवी (आईआईएचएस) ‘भारत का नगरीय रूपांतरण : चुनौतियों से अवसरों तक’ आईडीईओ
5 अक्टूबर, 2009
अरोमार रेवी (आईआईएचएस) द्वारा त्रिचूर में ‘लॉरी बेकर मेमोरियल लेक्चर’
30 सितम्बर, 2009
डॉ. गौतम भान (आईआईएचएस) ‘नयी दिल्ली में बेदखली और नगरीय नागरिकता’ एमआईटी में