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Re-framing Urban Inclusion

के बारे में

रि-फ्रेमिंग अर्बन इन्क्लूज़न, 36 मूल शिक्षण एवं अधिगम मामलों का कैटेलॉग विकसित करने के लिए फोर्ड फाउंडेशन द्वारा समर्थित एक सहयोगात्मक, बहु वर्षीय अनुसंधान परियोजना है। ये मामले, नगरीय वृत्तिकारों (अभ्यासकर्ताओं) को पूरे भारत तथा वैश्विक दक्षिण में नीतिगत वास्तविकताओं और नगरीय अभ्यास के उभरते स्वरूपों के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करेंगे।

चुनौती

भारत में नगरीय नीति, समावेशी नगरीय वृद्धि का आह्‌वान करती है, यद्यपि इस बारे में एक साझा समझ बनाने की आवश्यकता है कि नगरीय समावेशन का अर्थ क्या है तथा समावेशी नगरीय वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए एक एकीकरणात्मक नीतिगत ढांचे को किस तरह निर्धारित किया जाए। आज 30 प्रतिशत भारतीय शहरों में रहते हैं तथा भारत की वृद्धि में इसके नगरों की दो-तिहाई हिस्सेदारी है। चूंकि भारतीय नगर, सामाजिक और आर्थिक अवसरों के केंद्रों के रूप में विकसित होने शुरू हो चुके हैं, अतः वे सामाजिक और आर्थिक रूपांतरण के प्रमुख स्थल भी बनते जा रहे हैं। अग्रणी नगरीय नीतियां जैसे कि आरएवाई, जेएनएनयूआरएम तथा 74वां संशोधन, तथा एनयूएचएम और एनयूएलएम आदि पर चर्चाएं, ये सभी नगरीय समावेशन की बात करते हैं लेकिन यह भारत के लिए एक निर्णायक दौर है जब इस बारे में नई संकल्पनाएं तय की जाएं कि इसके नगरों के लिए सामाजिक और आर्थिक विकास का क्या अर्थ है तथा इस तरह नगरीय समावेशन की एक अधिक सुसंगठित समझ विकसित की जा सकेगी।

साक्ष्य निर्माण

2013 से 2015 तक, रि-फ्रेमिंग अर्बन इन्क्लूज़न, केस पद्धति द्वारा भारतीय नगरों की सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं को चिन्हित करने और अवधारित करने के लिए विभिन्न विषयक्षेत्रों के अग्रणी शिक्षाविदों और वृत्तिकारों (अभ्यासकर्ताओं) को एकजुट करेगी। ये केस (मामले) स्थानीय उदाहरणों का आनुभविक आधार निर्मित करेंगे जो वर्तमान में भली-भांति अभिलेखित नहीं हैं। तुलनात्मक दृष्टिकोण उपलब्ध कराने के लिए, यह परियोजना वैश्विक दक्षिण में अन्य नगरों से भी विकसित करने के लिए अनुसंधानकर्ताओं को शामिल करेगी।

अंतर्वैषयिक मामलों का यह सेट, वर्तमान तथा भावी नगरीय अभ्यासकर्ताओं को शिक्षित करने के लिए एकाधिक दृष्टिकोणों तथा शिक्षणविधियों को शामिल करेगा। ये मामले, नगरीय एकीकरण हेतु संभावित अवसरों तथा प्रणालियों के नए साक्ष्य प्रदान करेंगे, तथा राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से समावेशी नगरों हेतु एक संकल्पनात्मक तथा आनुभविक आधार निर्मित करेंगे।

मामलों के साथ शिक्षण एवं अधिगम

शिक्षण एवं अधिगम हेतु आनुभविक साक्ष्य तैयार करने तथा शिक्षणशास्त्रीय सामग्रियां विकसित करने के लिए आईआईएचएस में केस विकास एक महत्त्वपूर्ण अनुसंधान पद्धति है। आईआईएचएस, रि-फ्रेमिंग अर्बन इन्क्लूज़न केस कैटेलॉग से व्यापक जु़ड़ाव स्थापित करेगा। इन केसों (मामलों) में निम्न विशेषताएं होंगीः

  • आईआईएचएस की पाठ्‌यचर्या और पाठ्‌यक्रम में सीधे समावेशित होंगे
  • भारत में नगरीय मामलों पर नए अनुसंधान व अभ्यास हेतु आनुभविक आधार निर्मित करने के लिए आईआईएचएस के जारी कार्य में एकीकृत होंगे।
  • इनकी अभिगम्यता सार्वजनिक होगी, जिससे ज्ञान के अधिक खुले (उदार) नेटवर्क बनेंगे और नगरीय मामलों पर अधिक जागरूकतापूर्ण एवं महत्त्वपूर्ण बहसें संभव होंगी।

विषयवस्तु (थीमें)

नगरीय समावेशन को पुनः संरचित करना (रि-फ्रेमिंग अर्बन इन्क्लूजन) निम्न तीन थीमों पर नगरीय समावेशन का अन्वेषण करता है।

पूर्व-निर्धन नियोजन की संकल्पना

नगरीय नियोजन की प्रक्रियाएं, मूलभूत संसाधनों जैसे कि भूमि, आश्रय और आवास, आजीविकाएं, गतिशीलता और सुरक्षा तक पहुंच निर्धारित करती हैं। समावेशी नगरीय नियोजन का लक्ष्य शहर के सभी नागरिकों की आवश्यकताएं पूरी करने, भेद्यता, तथा और इन मूल संसाधनों तक पहुंच से अपवर्जन घटाने पर आधारित है।

इस थीम में केस (1) नगरीय नियोजन की वर्तमान स्थिति को सुलझाना तथा भेद्यता व अपवर्जन पर इसके प्रभाव स्पष्ट करना (2) इसका अन्वेषण करना कि किस प्रकार अधिक सार्थक सहभागिता, पूर्व-निर्धन नियोजन में अधिक प्रभावी हो सकती है, तथा (3) नगरीय नियोजन में संलग्न सभी एजेंसियों तथा संगठनों के लिए अवसरों को रेखांकित करना तथा सफल एकीकरण के उदाहरण।

आवास उन्नतीकरण तथा पुनर्आवासन का पुनरावलोकन

यह थीम, भारत में मलिन बस्तियों पर बहसों को विस्तारित तथा पुनर्संरचित करने के लिए है। ‘मलिन बस्ती’ नगरीय आवासन का वह रूप होता है जो भूमि बाज़ारों, नयी नगरीय राजनैतिक अर्थव्यवस्थाओं, निर्धनों को आवास उपलब्ध कराने के लिए राज्य की दक्षता, विभेदित राज्य-नागरिक संबंधों, विखंडित नगरीय अवसंरचना, विधि, वैधता एवं नियोजन के प्रश्न, तथा नगरीय नागरिकता की अवधारणाओं के प्रतिच्छेद पर स्थित होता है।

इस थीम में केस (1) परिणामों को आकार देने वाली बाज़ारी एवं राजनैतिक शक्तियों पर ध्यान देते हुए, आवासन तथा पुनर्आवासन की प्रक्रियाओं की पड़ताल करना, (2) आवासन रूपांतरण के दायरे को स्थानिक उन्नतीकरण से रूपांतरण के अन्य पहलुओं जैसे कि आजीविकाओं तथा रोजगार पर प्रभावों तक व्यापक करना, तथा (3) ‘संपत्ति अधिकारों’ और किरायेदारी नियमों की वैकल्पिक परिकल्पनाओं का अन्वेषण करना।

परिदृश्य का पुनः निरूपणः नगरीय समावेशन के मात्रिक (मीट्रिक्स)

नगरीय निर्धनता तथा भेद्यता की गतिकी को अपर्याप्त रूप से समझा गया है। हम जानते हैं कि कालावधि की सुरक्षा, नगरीय अवसरंचना तथा सेवा आपूर्ति की स्थानिक संगति, आजीविकाओं तथा रहने के स्थानों के बीच की आवागमन दूरियां, सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान तथा सामाजिक नेटवर्क, समावेशी नगरों में महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभाते हैं। हालांकि हमारे पास नगरीय भारत के अवस्थितिगत तथा वितरण पैटर्नों के बारे में सांखियकीय आंकड़े और सूचनाएं सीमित हैं।

इस थीम में केस (1) नगरीय निर्णय प्रक्रिया में डेटा के उपयोग का परीक्षण तथा हस्तक्षेप हेतु संभावित स्थलों की पहचान करना (2) सेक्टर-वार प्रशासकीय डेटा एकत्रीकरण पद्धतियों से आगे बढ़ते हुए, नगरीय गतिकी का अधिक संदर्भगत एवं अखंड विश्लेषण करना, (3) स्थानीय निर्णय-प्रक्रिया हेतु सूचनाओं, तथा अनुभवों से सीखने में सुधारों पर जोर देना।

मामले