PWP-UD

नगरीय विकास में कार्यकारी पेशेवरों हेतु कार्यक्रम (PWP-UD) को IIHS द्वारा ऐसे आरंभिक और मध्यवर्ती कार्यकारी पेशेवरों के लिए एक अंतर्वैषयिक, वृत्ति आधारित, पूर्णकालिक, आठ माह के प्रमाणपत्र कार्यक्रम के रूप में 2012 में प्रस्तुत किया गया, जो अपनी सक्षमताएं और पेशेवर योग्यता बढ़ाना चाहते हैं और अपने कैरियर पथ में महत्त्वपूर्ण मूल्य वृद्धि करना या परिवर्तन करना चाहते हैं। PWP-UD 2012-13 अक्टूबर 2012 से जून 2013 तक संचालित किया गया और निजी क्षेत्र (उदा. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज), सार्वजनिक उपक्रम (उदा. हुडको), ट्रेड यूनियनों और एनजीओ (उदा. सेवा) तथा प्रबंधन, अभियांत्रिकी व वास्तुकला से लेकर वित्त, विधि और अर्थशास्त्र आदि विविध विषय क्षेत्रों में कार्यरत स्वरोजगाररत पेशेवरों की बड़ी रेंज को आकर्षित किया।

PWP-UD 2012 को तीन अवधियों-फाउंडेशन, संकेंद्रण (कंसेंट्रेशन), चयनात्मक (इलेक्टिव) व परियोजना (प्रोजेक्ट) अवधियों-पर संरचित किया गया, जो परास्नातक कार्यक्रम की शिक्षणविधि को परिलक्षित करती हैं।

Overview

भूमि एवं आवासन

PWP-UD  की प्रथम अवधि में नगरीय विकास की प्रमुख अवधारणाएं, टूल, रूझान व बहसें प्रस्तुत करते हुए शिक्षणार्थियों के लिए फाउंडेशन निर्माण किया जाता है। यह शिक्षणार्थियों को मूल निर्माणक तत्वों से परिचित कराता है जो प्रत्येक नगरीय वृत्तिकार के लिए अनिवार्य हैं, चाहे उनका पूर्ववर्ती अकादमिक प्रशिक्षण व कार्य अनुभव या उनकी भावी कैरियर आकांक्षाएं जो भी हों। यह अवधि, अंतर्वैषयिक अधिगम हेतु एक आधार की तरह कार्य करती है क्योंकि इसमें प्रमुख फोकस क्षेत्रों जैसे कि प्रशासन, अवसंरचना, निर्मित परिवेश, नगरीय आर्थिकी आदि को कवर किया जाता है व उनकी पारस्परिक सहसंबद्धता व उनक बीच संपर्क से परिचित कराया जाता है। नीचे दिया गया आरेख, अवधि के प्रमुख घटकों को चित्रित करता है।

फाउंडेशन अवधि विविध पृष्ठभूमियों व कार्य अनुभवों वाले शिक्षणार्थियों को ‘नगरीय’ का साझा व्याकरण सीखने में सक्षम बनाती है जिसे बाद की अवधियों में उपयोग किया जाता है। शिक्षणार्थी, विभिन्न लेन्सों (स्थानिक, राजनैतिक, आर्थिक, अवसंरचनात्मक तथा पर्यावरणीय) का अन्वेषण करते और समझते हैं जिनके माध्यम से नगर का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। महत्त्वपूर्ण रूप से, यह अवधि शिक्षणार्थियों को ऐसे टूल व अवधारणाओं के उपयोग द्वारा मानव बस्तियों का विश्लेषण करने के आरंभिक कौशल सीखने हेतु प्रेरित करती है जो उससे अलग होते हैं जो उन्होंने अपनी शिक्षा व प्रशिक्षण में सीखा होता है।

प्रेक्टिस मॉड्‌यूल I फाउंडेशन अवधि का एक अभिन्न अंग है। इस मॉड्‌यूल में, शिक्षणार्थी अनुसंधान व अभ्यास के अनेक टूल जैसे कि सर्वेक्षण, साक्षात्कार, तथा प्रतिभागी पद्धतियां सीखते हैं, साथ ही यह भी सीखते हैं कि डेटा को कैसे एकत्रित, व्याख्यायित और विश्लेषित करें। इस मॉड्‌यूल में स्प्रेडशीट्‌स, प्रेजेंटेशंस, मैपिंग और डायग्रामिंग में मिनी स्किल-लैब्स की एक श्रृंखला शामिल है। एक श्रृंखला प्रबंधकीय विश्लेषण, संचार, सांगठनिक व्यवहार तथा प्रणालियों पर विचार सत्रों की भी होगी। ये कौशल और टूल, बंगलौर में विभिन्न साइटों पर अनुभवों के जरिए वास्तविक जगत की समस्याओं से भी जोड़े जाएंगे जिससे अन्य मॉड्‌यूल्स से अधिगमों को एकीकृत करने में मदद मिलेगी।

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कंसेंट्रेशन अवधि

12 सप्ताह की कंसेंट्रेशन अवधि में, शिक्षणार्थीः

  • विशिष्ट वृत्ति क्षेत्रों में गहन ज्ञान प्राप्त करते हैं
  • नगरीय वृत्ति के लिए पद्धतियां व उन्नत प्रबंधन कौशल सीखते हैं
  • साइट-आधारित प्रेक्टिस मॉड्‌यूल के माध्यम से अंतर्वैषयिक टीमों में वास्तविक जीवन से जुड़ी समस्याओं पर कार्य करते हैं
  • भारत व विदेशों के प्रमुख विचारकों व वरिष्ठ नीति व परिवर्तन प्रणेताओं द्वारा संचालित मास्टर कक्षाओं में भाग लेते हैं
  • भारतीय व एशियाई नगरों में संपर्क भ्रमण पर जाने के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करते हैं।

यह अवधि कंसेंट्रेशन ट्रैक के अनुसार विशिष्ट मूल पाठ्‌यक्रमों में संरचित है। प्रत्येक के बारे में जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंकों का उपयोग करें।

भूमि एवं आवासन

भारतीय नगरों द्वारा वर्तमान में सामना की जाने वाली भूमि एवं आवासन की सबसे कठिन चुनौतियों पर केंद्रित होने के लिए समाचारों की सुर्खियों से लेकर नीतिगत बैठकों और जनविरोधों तक को समझना आवश्यक है। यह संकेंद्रण, शिक्षणार्थियों को भूमि एवं आवासन के मसले विविध दृष्टिकोणों से देखने में सक्षम बनाता है और समानतापूर्व, प्रभावी व धारणीय बस्तियों के निर्माण की दिशा में उन्हें अनिवार्य कौशलों, ज्ञान व उपकरणों से लैस करता है। यह शिक्षणार्थियों के समक्ष चुनौतीपूर्ण प्रश्न उपस्थित करता हैः हमें नगरीय क्षेत्रों में भूमि कैसे अर्जित, मूल्यांकित, उपयोग, प्रबंधित और विकसित करनी चाहिए? भूमि किस प्रकार का संसाधन है और किन आर्थिक व सामाजिक उद्‌देश्यों के लिए इसका उपयोग किया जाना चाहिए? ऐसे निर्णय कैसे और किसके द्वारा, तथा किन विधिक, नीतिगत व प्रशासनिक रूपरेखाओं के अंतर्गत किए जाने चाहिए? भूमि पर प्रायः स्पर्धा करते आर्थिक, पर्यावरणीय, सामाजिक और राजनैतिक दावों को हम किस प्रकार संतुलित कर सकते हैं?

आश्रय और आवासन के प्रश्न, भूमि के प्रश्न से विकट रूप में संबंधित हैं। भारतीय नगरों को ‘नगरों से जुड़ी मलिन बस्तियों’ के रूप में पारिभाषित किया जाता है। नगरीय वृत्तिकारों की भावी पीढ़ी इस परिदृश्य को किस तरह चुनौती दे सकती और बदल सकती है? इस संकेंद्रण में आवासन हेतु एक एकीकृत उपागम का उपयोग किया जाता है जो इसे केवल आश्रय के रूप में नहीं, बल्कि एक कार्यस्थल, एक अधिकार, एक मूलभूत आवश्यकता, स्थानीय व राष्ट्रीय आर्थिक विकास रणनीतियों के एक प्रमुख घटक, खरीदी और बेची जाने वाली एक जिंस, संस्कृति व पहचान की एक अभिव्यक्ति, तथा बस्ती के निर्मित रूप के एक महत्त्वपूर्ण भाग के रूप में देखती है।

इस संकेंद्रण को चुनने वाले शिक्षणार्थी, भूमि एवं आवासन में विशेषज्ञताप्राप्त सलाहकार के रूप में अन्य के अतिरिक्त स्थानीय, राज्य व केंद्र स्तर पर नीति निर्माण व क्रियान्वयन में रत सरकारी संस्थानों, उदाहरण के लिए जेएनएनयूआरएम तथा आरएवाई; अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसियों में, आवास वित्त संस्थानों व बैंकों में, वास्तुविद व नियोजन फर्मों में, विकासकर्ताओं व रियल एस्टेट फर्मों/परामर्शियों में, या किफायती आवासन तथा आवासन व भूमि अधिकारों को बढ़ावा देने वाले सामुदायिक संगठनों व एनजीओ में कार्य कर सकते है।

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जल एवं नगरीय पर्यावरणीय सेवा

जल, अपशिष्ट जल, जलनिकासी तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन सेवाओं हेतु हमारी नियोजन प्रविधि (उपागम) में हम आयामी बदलाव देख रहे हैं। 12वीं योजना का दस्तावेज, इस बदलाव का स्पष्ट प्रमाण है। 12वीं योजना में प्रस्तावित उपागम, अधिक एकीकृत व अखंड है तथा जल, अपशिष्ट जल, वर्षाजल, नगरीय नियोजन, नगरीय अभिकल्प, व ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के बीच अंतर्संबंधों को मान्यता देता है।

ये नीतिगत बदलाव, भारत में नगरीय पर्यावरणीय सेवाओं के भविष्य को लेकर उल्लेखनीय प्रश्न खड़े करते हैं जिन पर इस संकेंद्रण में फोकस किया जाएगा। भारतीय नगर, जल की बढ़ती मांग को किस तरह पूरा करेंगे? क्या हमारे नगरों के लिए 24×7 जलापूर्ति संभव है और इस दिशा में प्रयास वांछनीय होंगे? क्या हमारे नगर, गंभीर सामाजिक व पर्यावरणीय संघर्षों को उत्प्रेरित किए बिना अपनी जल आवश्यकताएं पूरी कर सकते हैं? हमें नगरीय अपशिष्ट जल व ठोस अपशिष्ट की अपशिष्ट प्रवाह धाराओं से कैसे निबटना होगा? जलापूर्ति व अपशिष्ट-जल प्रबंधन के संबंध में प्रवाहित वर्षाजल व भूमिगत जल प्रबंधन की क्या भूमिका है?

यह संकेंद्रण पथ, शिक्षणार्थियों को ऐसे अभीष्ट कौशल, दृष्टिकोणों व ज्ञान से लैस करने पर लक्षित है नगरीय पर्यावरणीय सेवाओं के क्षेत्र में उभरती चुनौतियों व संभावनाओं का समाधान करने के लिए आवश्यक हैं। विशेष रूप से, यह भारतीय नगरों के संदर्भ में एकीकृत नगरीय जल प्रबंधन रूपरेखा, व नगरीय ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में उभरते उपागमों की संभावनाओं के अन्वेषणों पर लक्षित है। इस संकेंद्रण को चुनने वाले शिक्षणार्थी, नगरीय पर्यावरणीय सेवाओं के क्षेत्र में कार्यरत विविध संगठनों जैसे कि अवसंरचना विकास तथा वित्त कंपनियां, पालिका एजेंसियां, एनजीओ, व अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसियों में कैरियर बना सकते हैं। वे विविध आकारों वाली नगरीय अवसंरचना परियोजनाओं पर कार्यरत सलाहकार टीमों के अंग बनकर भी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभा सकते हैं।

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विकास, निर्धनता, एवं रोजगार

समावेशी वृद्धि और समतापूर्ण विकास वाली किसी भी शासन व्यवस्था के लिए रोजगार, एक मुख्य केंद्रबिंदु है, तथापि निर्धनता से इसके अंतर-संबंधों पर स्थानीय सरकार से लेकर अंतर्राष्ट्रीय विकास चर्चाओं में सभी स्तरों पर आनुपातिक रूप से कम ध्यान दिया गया है। आर्थिक संवृद्धि के विविध आयामों में कौन सी रणनीतियां, निर्धनता को कम करने तथा आजीविका विकल्प बढ़ाने में सबसे अधिक कारगर हैं? भारत में आर्थिक नियोजन एवं सार्वजनिक नीति के किन साधनों का उपयोग समतापूर्ण विकासात्मक परिणामों की दिशा में प्रत्यक्ष निवेशों हेतु किया जा सकता है? चूंकि निजी, सार्वजनिक व अन्य कार्यकर्ता, संवृद्धि के परिणामों व गतिशीलताओं से उलझे हुए हैं और भारत, रोजगार, निर्धनता और सामाजिक सुरक्षा के कई बड़े कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी में है, ऐसे में भारत हेतु समावेशी संवृद्धि की प्राप्ति के लिए शिक्षणार्थियों द्वारा संवृद्धि, रोजगार और निर्धनता की समस्याएं दूर करने हेतु कौशलों, रणनीतियों व दृष्टिकोणों से परिचित होना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

यह संकेंद्रण, शिक्षणार्थियों को रोजगार, निर्धनता व आर्थिक विकास के अंतर्मिलन में कैरियरों हेतु तैयार करता है। इस संकेंद्रण वाले शिक्षणार्थी अनेक बहु-पार्श्विक, सार्वजनिक और निजी विकासात्मक एजेंसियों, थिंक-टैंकों, प्रबंधन परामर्शदात्री फर्मों, सीएसआर प्रयासों और फाउंडेशनों के साथ कार्य कर सकते हैं और संबंधित मंत्रालयों, अर्धसरकारी व नगरीय स्थानीय निकायों के साथ प्रभावी भूमिका परामर्श के साथ योजनाएं व कार्यक्रम विकसित व क्रियान्वियत करने में भूमिका निभा सकते हैं तथा स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय सामुदायिक संगठनों में शामिल हो सकते हैं।

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परियोजना टीम

वास्तविक जगत की जटिलता के सापेक्ष स्वयं का परीक्षण करने के लिए तथा कार्य एवं अभ्यास की दुनिया में वापस रूपांतरण शुरू करने के लिए कक्षा शिक्षण हेतु PWP-UD 2013 में दो माह के, पर्यवेक्षित और स्वतंत्र व्यक्तिगत परियोजना पर विशेष जोर दिया गया है। ये परियोजनाएं किसी संस्थान, फर्म, सार्वजनिक एजेंसी, किसी अनौपचारिक संघ में इंटर्नशिप्स या नियोजन के रूप में या स्वतंत्र वृत्ति, अनुसंधान या लेखन के रूप में हो सकती हैं। प्रत्येक मामले में, प्रत्येक शिक्षणार्थी IIHS संकाय के एक सदस्य और संस्थान से पारस्परिक लाभप्रद परिणाम पर आधारित एक अनुबंध करता है जो विविध स्वरूप ले सकता हैः एक अवधारणात्मक पत्र, नीति सार या विश्लेषण, तकनीकी प्रतिवेदन, स्थानिक योजनाएं, बिजनेस मॉडल, तकनीकी प्रतिवेदन, फिल्म और वीडियो व अन्य।

परियोजनाएं प्रायः भावी नियोजनों से घनिष्ठ संबंधित होती हैं, शिक्षणार्थियों व संस्थानों को दीर्घकालीन उपयुक्त रोजगार हेतु आकलन का समय प्रदान करती हैं। वैकल्पिक रूप में, नए वृत्ति क्षेत्र में स्वयं को संलग्न करने तथा व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने का वे उत्कृष्ट तरीका हैं। परियोजना अवधि के बाद कार्यक्रम में वापसी, शिक्षणार्थियों को वृत्ति अवधि पर चिंतन करने तथा विशिष्ट कौशल या ज्ञान समुच्चय पहचानने का अवसर देती है, जिनकी आवश्यकता उन्हें चयनात्मक अवधि में विकल्प चुनने के दौरान लगती है।

PWP-UD में पूर्ववर्ती शिक्षणार्थियों द्वारा की गई विविध परियोजनाएं निम्न हैं:

एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन- कर्नाटक राज्य का एक केस अध्ययन
संस्थानः हुडको
अवस्थितिः बंगलौर और दिल्ली

40 वर्षों के अस्तित्व और कार्य के पश्चात सेवा की नगरीय रणनीति का सिंहावलोकन
संस्थानः सेल्फ एम्प्लायड वूमेन्स एसोसिएशन (सेवा)
अवस्थितिः अहमदाबाद

भूमि प्राप्ति एवं विकासः एक डीएमआरसी केस अध्ययन
स्थानः दिल्ली मेट्रो रेल कार्पोरेशन
अवस्थितिः दिल्ली

कानपुर में घरेलू कामगारों की आजीविका एवं कौशल विकास
संस्थानः होमनेट साउथ एशिया
अवस्थितिः कानपुर

कोलकाता महानगरीय क्षेत्र में जेएनएनयूआरएम-बीएसयूपी कार्यक्रम का प्रभाव मूल्यांकन
संस्थानः हुडको
अवस्थितिः कोलकाता

आश्रयहीनता के संदर्भ में निर्धनता एवं भेद्यता का एक अध्ययन
संस्थानः सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज
अवस्थितिः दिल्ली

इलेक्टिव (चयनात्मक) अवधि

चयनात्मक अवधि में शिक्षणार्थी, मुख्य वृत्ति क्षेत्रों में सघन, विशिष्ट पाठ्‌यक्रम सीखते हैं। सभी पाठ्‌यक्रम, किसी भी कंसेंट्रेशन ट्रैक वाले शिक्षणार्थियों के लिए खुले हैं। शिक्षणार्थी निम्न में से कोई तीन (या अनुमति के साथ चार) पाठ्‌यक्रम चुन सकते हैं:

मलिन बस्ती उन्नयन एवं पुनर्विकास
इस चयनात्मक का फोकस मलिन बस्ती उन्नयन अर्थात नगरीय निर्धन बस्तियों के स्थानिक, सामाजिक, विधिक और आर्थिक रूपांतरण पर है। मलिन बस्ती उन्नयन अनेक दशाओं में होता है-बलपूर्वक या अस्वैच्छिक विस्थापन या सार्वजनिक या निजी पुनर्विकास परियोजनाओं में विविध प्रकार की भागीदारी के रूप में-और इसकी रेंज में स्वस्थाने उन्नयन, निकटवर्ती (कभी-कभी निकटस्थाने उन्नयन कहा जाता है) या नगर के अन्य भागों में फिर से बसाया जाना शामिल किया जा सकता है। यह चयनात्मक, मलिन बस्ती उन्नयन में प्रमुख भारतीय व अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों पर संरचित है जो इसकी बारीक पड़ताल करेगा कि किस तरह भारतीय संदर्भ में उन्नयन को अवधारित, अभिकल्पित तथा कार्यान्वित किया गया है। यह पाठ्‌यक्रम, मुख्य प्रश्नों की एक श्रृंखला के माध्यम से उन्नयन पर विचार करेगाः

  • किसी विशेष बस्ती के लिए किस आधार पर एक विकासात्मक प्रक्षेपपथ चुना जाता है, या दूसरे शब्दों में, किस प्रकार यह निर्धारित किया जाता है कि किस प्रकार का उन्नयन या पुनर्वास किया जाएगा?
  • प्रक्रिया का प्रबंधन व नेतृत्व किन कार्यकर्ताओं व संस्थानों द्वारा किया जाता है?
  • पात्रता की शर्तें तथा लाभार्थियों का चिन्हांकन किस प्रकार तय किया जाता तथा क्रियान्वित किया जाता है?
  • उन्नयन का वित्तपोषण कैसे किया जाता है?
  • पृथक रूप से बस्तियों के उन्नयन को नगर-स्तरीय नगरीय विकास, नियोजन व गतिशीलताओं से कैसे संबंधित किया जाता है?
  • अधिकारों, हकदारियों, मुआवजों, तथा प्रक्रिया में भागीदारी के संदर्भों में वर्तमान निवासियों की सहभागिता की क्या शर्तें हैं? किसी उन्नयन परियोजना की ‘सफलता’ को कैसे मापा जाता है?

भूमि अर्जन एवं पुनर्वासन
यह इलेक्टिव, भारत की राजनैतिक अर्थव्यवस्था के ढांचे में भूमि की अवस्थिति पर तथा ग्रामीण-नगरीय प्रश्नों सहित नगरीकरण पर बहसों में भूमि की प्रमुखता पर फाउंडेशन अवधि में चर्चा की गई पूर्ववर्ती समझ को विस्तृत बनाता है। यह भारतीय संविधान के अंतर्गत विधिक विवरणों तथा संबंधित राज्य कानूनों में घोषित विशिष्ट नियमों की पड़ताल करता है। समाधान की जाने वाली प्रमुख अवधारणात्मक थीमों में प्रभुत्वशाली क्षेत्र, भूमि अर्जन (विशेषकर संसद में नवीनतम एलएआरआर विधेयक), भूमि हस्तांतरण, किराएदारी के कानून, भू अभिलेख तथा स्वामित्व के मसले और सामान्य वर्ग के प्रश्न शामिल हैं। भू उपयोग विनियम तथा भू उपयोग के विविध विधिक उपागम, जैसा विविध नगरों में परिलक्षित हैं, अन्वेषित किए जाएंगे। परीक्षण किए जाने वाले हाल के कुछ उदाहरणों में नया रियल एस्टेट रेगुलेटर विधेयक (तथा महाराष्ट्र का विशिष्ट विधेयक), पीपीपी, एसईजेड, डीएमआईसी, व नगर के अधिकार पर बहसें शामिल हैं। न केवल मसलों पर बल्कि विविध कार्यकर्ताओं की भूमिका पर भी जोर दिया जाएगा जो नगर में जटिल भूमि बहसों में विविध भूमिकाएं निभाते हैं।

भारत में नियोजन प्रविधियां
भारतीय संदर्भ में नगरीय नियोजन, व्यापक रूप में भौतिक रूप से निर्धारित किया जाता रहा है। हालांकि अब परिवर्तन की शुरूआत हो चुकी है, नगर विकास योजनाएं अधिक अखंड, एकीकृत उपागम अपना रही हैं। मौजूदा योजनाओं व वास्तविक-जगत के मामलों पर आधारित यह पाठ्‌यक्रम, भारत में नियोजन प्रविधि का परीक्षण करेगा जिसमें उदाहरण के लिए नगरीय क्षेत्र को प्रशासित करने वाले विनियमों, विभिन्न प्रकार की योजनाओं व उनके प्रकार्यों आदि की पड़ताल की जाएगी। यह पाठ्‌यक्रम, शिक्षणार्थियों को भारत में नगरीय नियोजन की समझ विकसित करने में मदद करेगा तथा उन्हें विभिन्न प्रकार की नियोजन प्रक्रियाओं व योजना दस्तावेजों का मूल्यांकन करने के लिए महत्त्वपूर्ण टूल्स उपलब्ध कराएगा।

नगरीय पीपीपी प्रविधि
यह पाठ्‌यक्रम, सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) ढांचे की रूपरेखा प्रदान करेगा। यह भारत तथा अन्य विकासशील देशों में नगरीय सेक्टर में पीपीपी का गहन विश्लेषण करने में सक्षम बनाएगा। यह इस क्षेत्र में भावी कार्रवाई के लिए अंतर्दृष्टि विकसित करने में सहायक होगा। नगरीय जल, नगरीय वाहित मल, नगरीय ठोस अपशिष्ट, व नगरीय सुविधाओं जैसे कि बाज़ार इत्यादि पर केंद्रित सत्र हैं। सेवाओं, विभिन्न पक्षकारों की भूमिका, मुख्य चुनौतियों, और विनियमन स्थिति के महत्त्वपूर्ण अवलोकन द्वारा वर्तमान परिदृश्य की समग्र समझ प्रदान की जाएगी। नगरीय विकास कार्यक्रमों में पीपीपी की सफलताओं व विफलताओं का निर्धारण करने के लिए शिक्षणार्थी, अनेक केस अध्ययनों पर कार्य करेंगे। उन्हें पीपीपी मॉडलों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया जाएगा जो वर्तमान परिदृश्य में कारगर होने संभावित हैं। पाठ्‌यक्रम को संपूर्णता प्रदान करने के लिए पर्यावरणीय और सामाजिक धारणीयता के मसलों तथा नए एकीकृत और विकेंद्रित उपागमों पर, तथा नीतियों, विनियमों और संस्थागत संरचना के लिए उनके प्रभावों के बारे में चर्चा की जाएगी।

नगरीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन
जलवायु परिवर्तन संबंधी चर्चाओं का फोकस प्रायः राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की बातचीत व उपायों पर रहता है, जिन्हें वैश्विक स्तर पर लाने की आवश्यकता है ताकि हमें जलवायु परिवर्तन और इसके प्रभावों का सामना करने में मदद मिले। हालांकि चरम मौसम घटनाओं की बढ़ती तीव्रता और संख्या से यह स्पष्ट हो गया है कि जलवायु परिवर्तन के अधिकाधिक प्रभाव स्थानीय स्तर पर, विशेषकर नगरों में महसूस किए जाएंगे। यह पाठ्‌यक्रम इस पर फोकस करेगा कि किस तरह से विभिन्न स्तरों पर विविध पक्षकार, जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन करने तथा इसके प्रभावों को न्यूनीकृत करने में सहायता कर सकते हैं। यह पाठ्‌यक्रम, अनुकूलन और न्यूनीकरण पर, विशेषकर इस बारे में कि किस प्रकार से दोनों को पृथक-पृथक रखने के बजाय समानांतर लाने की आवश्यकता है, व्यापक चर्चा के साथ शुरू होगा। तब हम शेष पाठ्‌यक्रम को केस आधारित शिक्षण के प्रति समर्पित करेंगे जहां हम उन भूमिकाओं का गहन परीक्षण करेंगे जो विविध पक्षकारों, जिनमें निजी क्षेत्र के कार्यकर्ताओं से लेकर नागरिक समाज तक के लोग शामिल हैं, की हो सकती हैं और वे अनुकूलन उपायों में निभाते हैं।

एकीकृत नगरीय आपदा जोखिम घटोत्तरी

भारतीय उपमहाद्वीप, विविध प्राकृतिक संकटों जैसे कि भूकम्प, भूस्खलन, बाढ़ों और चक्रवातों के प्रति असुरक्षित है। इसके अलावा, अनियोजित नगरीकरण के परिणामस्वरूप पर्यावरणीय निम्नीकरण (उदा. निर्वनीकरण), प्राकृतिक संसाधनों का अतिदोहन (उदा. जल), पारिस्थितिकी व्यवधान (उदा. प्रदूषण) तथा सामाजिक कठिनाईयां (उदा. निर्धनता) बढ़ने के कारण आपदाओं के प्रति नगरों की भेद्यता बढ़ती जा रही है। आपदा सहनशील नगर बनाने के लिए ऐसा एकीकृत उपागम अपनाना महत्त्वपूर्ण है जो समग्र मूल्यांकन, न्यूनीकरण तथा पूर्वतैयारी के लिए विविध संकटों और भेद्यताओं को ध्यान में रखे और नगरीय विकास के धारणीय लक्ष्यों में आपदा जोखिम घटोत्तरी को एकीकृत करे। इस इलेक्टिव को पूर्ण करके, शिक्षणार्थियों को नगरीय संदर्भ में आपदा प्रबंधन प्रक्रियाओं पर मजबूत पकड़ मिलेगी और वे निम्न में सक्षम होंगेः

  • एक एकीकृत उपागम का उपयोग करते हुए नगरीय संदर्भ में आपदा जोखिमों की पहचान और मूल्यांकन
  • आपदा जोखिम घटोत्तरी के लिए प्रभावी रणनीतियों एवं प्रणालियों का नियोजन एवं विकास
  • आपदा न्यूनीकरण तथा पूर्वतैयारियों के लिए प्रभावी नीतियों का प्रतिपादन एवं नियोजन किया जाना
  • नगरों में प्रभावी आपदा जोखिम प्रबंधन के लिए क्रियान्वयन के मुख्य मसलों और अपेक्षाओं के समाधान और आकलन
  • आपातकालीन पूर्वतैयारियों हेतु विशिष्ट योजनाओं व प्रक्रियाओं का विकास तथा विविध पक्षकारों के बीच समन्वय द्वारा प्रतिक्रिया

पर्यावरणीय नियोजन एवं प्रशासन
यह पाठ्‌यक्रम इसकी पड़ताल करेगा कि विभिन्न संस्थानों, संपत्ति अधिकार नियमों, स्वास्थ्य, आजीविका एवं पर्याप्त आवासन के अधिकारों से पर्यावरणीय अधिकारों के अंतर्मिलन, पर्यावरणवाद के नियमों, सक्रियतावाद की रणनीतियों, तथा न्यायपालिका की भूमिका के इष्टतम पैमाने कौन से हैं। भूमि, आमजन के मसले, नियोजन नियम, क्रियान्वयन के असमंजस और रणनीतियां, पाठ्‌यक्रम के अंग होंगे। अनेक केस अध्ययनों और उदाहरणों का उपयोग करते हुए यह पाठ्‌यक्रम, इन प्रक्रियाओं की राजनीति तथा नीति क्रियान्वयन से संबंधित चुनौतियों का भी परीक्षण करेगा।

वृत्ति में नगरीय नीति सुधार
यह पाठ्‌यक्रम, कक्षा शिक्षण को वास्तविक-जगत में नगरीय सुधारों के अनुप्रयोगों से संश्लेषित करता है। प्रशासन तथा संस्थागत व्यवस्थाओं की वर्तमान प्रकृति का परीक्षण करते हुए, यह पाठ्‌यक्रम शिक्षणार्थियों को नगरीय सेवाओं की वर्तमान स्थिति व उनके सुधार के मसलों का मूल्यांकन करने में मदद करेगा। इसके पश्चात नगरीय सुधार के विविध उपागमों से परिचित कराया जाएगा जिनमें क्रमिक उपागम से लेकर बड़े परिवर्तन तथा उद्‌गामी परिणाम तक शामिल हैं। प्रतिभागी केस अध्ययनों, सेक्टोरल और नीति विश्लेषणों, तथा समुदाय आधारित सहभागी अभ्यासों के परिणामों का उपयोग करते हुए रूपांतरण के अवसरों की पहचान करेंगे जिनमें नगरीय प्रशासन और सेवा आपूर्ति की संस्थागत संरचना से संबंधित संभावनाएं तथा क्लाइंट्‌स और समुदायों से इंटरफेसिंग भी शामिल हैं।  यह पाठ्‌यक्रम, सुधारों की शुरूआत करने तथा सुधारों को धारणीय बनाए रखने के प्रवेश-बिंदुओं की पहचान के साथ समाप्त होता है।

गतिशीलता
यह पाठ्‌यक्रम परिचयात्मक पाठ्‌यक्रम को आगे बढ़ाते हुए, धारणीय नगर व इसकी गतिशीलता प्रणालियों के बीच जटिल संपर्कों की पड़ताल करेगा। प्रतिभागी, गतिशीलता तथा भू उपयोग नियोजन के अंतर्संपर्कों तथा उन तरीकों के बारे में गहराई से सीखेंगे जिनके द्वारा यह भारतीय नगरों की भावी वृद्धि निर्धारित कर सके। इसके अतिरिक्त, प्रतिभागी विश्व में सर्वोत्तम केस अभ्यासों, परिवहन, मांग प्रबंधन में उन्नत पद्धतियों, तथा भारतीय नगरों हेतु इसकी प्रासंगिकता के बारे में विस्तार से जानेंगे।

रियल एस्टेट तथा संपत्ति बाज़ार
भारतीय नगरों की परिवर्तनशीलता व वृद्धि की गतिकी में रियल एस्टेट तथा संपत्ति बाज़ारों की भूमिका अब निस्संदेह अधिकाधिक महत्त्वपूर्ण होती जा रही है। यह पाठ्‌यक्रम, प्रमुख प्रश्नों के समुच्चय का अन्वेषण करते हुए भारतीय रियल एस्टेट बाज़ार को समझने पर फोकस करता हैः यह किस प्रकार संरचित व विनियमित है? खिलाड़ी कौन हैं? नगरों में, तथा विभिन्न नगरों व क्षेत्रों के बीच बाज़ार गतिकी किस तरह से भिन्न है? नगरीकरण के नए स्वरूप जैसे कि कॉरिडोर और एसईजेड, बाज़ार को किस तरह से आकार दे रहे हैं? ऐसे गतिशील बाज़ारों में फर्में किस तरह से सर्वोत्तम ढंग से संगठित हो सकती हैं, कार्य कर सकती हैं और हस्तक्षेप कर सकती हैं। उभरते बाज़ार कहां स्थित हैं? बाज़ार, आवास वित्त की संरचना से किस प्रकार संबंधित हैं? रियल एस्टेट को विनियमित करने के बारे में उभरती बहसें, या सेक्टर के लिए ‘उद्योग’ या ‘अवसंरचना’ का दर्जा हासिल करने के प्रयास किस प्रकार भूमिका निभाते हैं?

इमर्सन विजिट्‌स

एक पेशेवर के रूप में, क्या आप खुद को निरंतर विविधतापूर्ण होते जाते राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संदर्भों व टीमों में काम करते पाते हैं? प्रत्येक नई परियोजना शुरू होने पर, क्या आप पाते हैं कि आपको कड़ी समयसीमाओं में तत्काल आकलन करने व नए परिवेश में कार्य करने की आवश्यकता है? नगरीय निवासी के रूप में क्या कभी आपने सोचा है कि किस तरह से अन्य नगर उन समस्याओं से निबटते और समाधान करते हैं जिनका आपका नगर भी सामना करता है?

जहां भारतीय संदर्भ की विशिष्टताओं में अवस्थित होना अनिवार्य है, वहीं यह देखना भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है कि किस तरह से विचार, बहसें और वृत्तियां, नगरों के बीच गमन कर सकते हैं। एक अधिक अंतर्संबंधित होते जाते विश्व में -विशेषकर वैश्विक नगरों के मामले में-एक तुलनात्मक दृष्टिकोण अपनाना, नगरीय वृत्तिकारों की नई पीढ़ी के लिए कोई विलासिता के बजाय वास्तव में एक मूल आवश्यकता है।

नए नगरीय परिवेश को पढ़ने और समझने के तरीके सीखने के कौशल विकसित करने के लिए, तथा तुलनात्मक एवं आलोचनात्मक विश्लेषण के बीच तेजी से अपना स्थिति निर्धारण करने के लिए, PWP-UD ने विविध पैमानों व भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार इमर्सन विजिटों की एक श्रृंखला तैयार की है, जो पूरे पाठ्‌यक्रम पर विस्तृत है। ये निम्न हैं:

बंगलौर महापालिका क्षेत्र में इमर्सन विजिटें
कर्नाटक के कस्बों व नगरों में इमर्सन विजिटें
अन्य भारतीय नगरों में इमर्सन विजिटें
मुख्य एशियाई नगरों में इमर्सन विजिटें

तीन दिन से दो सप्ताह तक की अवधि वाली ये विजिट्‌स को IIHS संकाय सदस्यों व IIHS के साझेदार संस्थानों द्वारा तैयार किया गया और सुविधाजनक बनाया गया है। ये प्रेक्टिस मॉड्‌यूल्स की तरह संरचित हैं जहां शिक्षणार्थी, एक नए नगरीय परिवेश की जांच-पड़ताल करेंगे, कक्षा सत्रों में सीखे कौशलों व दृष्टिकोणों का उपयोग करते हुए विश्लेषण करेंगे और समाधान विकसित व प्रस्तुत करने के लिए कौशल विकसित करेंगे। इसमें उनकी सहायता के लिए, विजिटों को विभिन्न सेक्टरों के सार्वजनिक कार्मिकों, विशेषज्ञों, अकादमिकों और अध्येताओं, नागरिक समाज कार्यकर्ताओं व वृत्तिकारों के साथ कई सेमिनारों, बैठकों और क्षेत्रीय भ्रमणों के साथ संरचित किया गया है।

PWP-UD 2012 में, शिक्षणार्थियों ने भारत में रामनगर (कर्नाटक), नासिक (महाराष्ट्र), विजयवाडा (आंध्र प्रदेश), तथा एशियाई इमर्सन के लिए बैंकाक (थाईलैण्ड) में विजिटें कीं। PWP-UD 2013 का प्रस्ताव अंतर्राष्ट्रीय इमर्सन ट्रिप विकल्पों को बैंकाक और मनीला तक विस्तृत करने का है। यह एशियाई नगरीकरण की गतिशीलता, तथा भारतीय संदर्भ से इसके अंतर्संपर्कों को अन्वेषित करने के लिए IIHS की प्रतिबद्धता प्रदर्शित करता है। सभी इमर्सन विजिटों हेतु व्यय को पाठ्‌यक्रम शुल्क में सम्मिलित किया गया है।

Immersion Visit: India – Watch Video
Immersion Visit: Asia – Watch Video

नियुक्तियां

IIHS प्लेसमेंट सेल ने इंटर्नशिप व नियुक्तियों के लिए विविध प्रकार के संस्थानों से संबंध कायम किए हुए हैं। सेल्फ-एम्प्लॉयड वूमेन्स एसोसिएशन (सेवा), लेबरनेट, तथा सत्व डेवेपलमेन्ट कंसल्टिंग व अन्य इसमें शामिल हैं।

IIHS PWP-UD के शिक्षणार्थी, पूरे भारत भर में विभिन्न संस्थानों में नियुक्त हुए हैं, जिनमें निम्न शामिल हैं:

  • महिला हाउसिंग ट्रस्ट, सेल्फ-एम्प्लॉयड वूमेन्स एसोसिएशन
  • हाउसिंग एंड अर्बन डेवेलपमेन्ट कार्पोरेशन (हुडको)
  • टाटा कंसल्टैंसी सर्विसेज
  • होमनेट साउथ एशिया
  • सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज, दिल्ली
  • लेबरनेट