यूएनडीपी (UNDP)

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Rio+20 के उत्तरवर्ती परिवेश में, यूएनडीपी तथा आईआईएचएस, मानवीय विकास के नजरिए से निर्धनता एवं भेद्यता घटोत्तरी, आपदा जोखिम घटोत्तरी तथा जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के विषयों पर दक्षिण एशिया तथा वैश्विक दक्षिण में दृष्टिकोण व क्षमताओं का एकीकरण करने की बढ़ती ज़रूरत देखते हैं। विकास हेतु एकीकृत नियोजन पर यूएनडीपी-आईआईएचएस संयुक्त कार्यक्रम के तहत, यूएनडीपी और आईआईएचएस ने विकास नियोजन हेतु एक रूपरेखा तथा प्रचालनीय ढांचा विकसित किया। यह परियोजना 02 नवम्बर, 2012 से 31 दिसम्बर, 2013 तक चली।

कार्यक्रम

पालिका अधिकारियों के लिए, एकीकृत प्रविधि के माध्यम से लोचशीलता निर्माण पर यूएनडीपी-आईआईएचएस अल्पावधि पाठ्‌यक्रम | 15-20 सितम्बर, 2014

पाठ्‌यक्रम विवरण
विगत तीन पाठ्‌यक्रमों के अनुभव के आधार पर, पालिका अधिकारियों के लिए, एकीकृत प्रविधि के माध्यम से लोचशीलता निर्माण पर यूएनडीपी-आईआईएचएस अल्पावधि पाठ्‌यक्रम, पालिका अधिकारियों की क्षमता निर्मित करने के लिए है। यह पाठ्‌यक्रम उनको मानव विकास पर केंद्रित होने के साथ जलवायु परिवर्तन अनुकूलन (सीसीए) तथा आपदा जोखिम घटोत्तरी (डीआरआर) प्रविधि के एकीकरण के माध्यम से लोचशीलता-निर्माण एवं भेद्यता घटोत्तरी पर कुशल बनाने के लिए है। विभिन्न क्षेत्रों व पैमानों पर सीसीए, डीआरआर और विकास योजनाओं, नीतियों व कार्यक्रमों को इस प्रकार डिजाइन व लागू करने का उद्‌देश्य है कि वे जलवायु एवं आपदाओं के जोखिमों के सापेक्ष व्यक्तियों, परिसंपत्तियों (प्राकृतिक एवं निर्मित) तथा व्यवसायों की भेद्यता कम कर सकें।

यूएनडीपी परियोजना अधिकारियों के लिए, यूएनडीपी-आईआईएचएस अल्पावधि पाठ्‌यक्रम | 26-27 जून, 2014

पाठ्‌यक्रम विवरण
विगत दो पाठ्‌यक्रमों के अनुभवों के आधार पर, यूएनडीपी और आईआईएचएस ने यूएनडीपी परियोजना अधिकारियों के लिए एक अल्पावधि पाठ्‌यक्रम हेतु सहयोग किया है। यूएनडीपी परियोजना स्टॉफ की क्षमताएं संवर्धित करना इस पाठ्‌यक्रम का उद्‌देश्य है, जिनमें राष्ट्रीय स्तर के स्टॉफ और राज्य स्तर के परियोजना अधिकारी शामिल हैं। कोर्स का फोकस, विशेषकर वर्तमान प्रशासनिक रूपरेखा में आपदा जोखिम घटोत्तरी, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, तथा मानव विकास के बीच संबंधों पर है।

एकीकृत विकास प्रविधि के माध्यम से लोचशीलता निर्माण | 18-23 नवम्बर, 2013 | 9 – 14 दिसम्बर, 2013

पाठ्‌यक्रम विवरण

हाल के समय में, जलवायु परिवर्तन तथा आपदा जोखिम, भारत द्वारा सामना की जाने वाली विकट चुनौतियां बन गई हैं। यदि मुम्बई की बाढ़, भुज के भूकम्प, उत्तराखंड में बादल फटने, और हाल के समय में हुई अन्य प्राकृतिक आपदाओं से कोई सबक सीखा जा सकता हो, तो ‘यथास्थिति वाली सोच’ अब तर्कसंगत नहीं रह गई है। भविष्य में मौसम के चरम रूपों में बढ़ोत्तरी होने की संभावना यह बताती है कि मौसम आधारित आपदाओं की संख्या और भयावहता में भी बढ़ोत्तरी होगी। ये आधारभूत ढांचे तथा प्राकृतिक संपत्त्यिों को नष्ट करेंगी, महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक सेवाओं और आर्थिक गतिविधियों को बाधित कर देंगी, तथा आजीविकाओं व मानव स्वास्थ्य पर अनियमित व दीर्घकालीन प्रभाव डालेंगी। विस्तारित समय अवधि के दौरान अनेक मोर्चों पर विकासात्मक लाभों जैसे कि निर्धनता घटोत्तरी और शिक्षा व स्वास्थ्य में सुधार के सापेक्ष आपदाओं को शीघ्र ही दुर्बल कर दिया जाएगा।

आपदाएं घटित होने पर उनके प्रभाव, कम मानव विकास वाले समुदायों व परिवारों पर अधिक गहरे होते हैं, उनकी क्षमता या पुनर्प्राप्ति की दर को प्रभावित करते हैं या जोखिम के प्रति उनकी असुरक्षित स्थिति को बढ़ा देते हैं। विकास, जलवायु परिवर्तन तथा आपदा प्रबंधन के वर्तमान नियोजन में प्रायः कुछ निश्चित जनसंख्याओं की सतत्‌ भेद्यता के कारण उनके द्वारा सामना की जाने वाली क्षति के परिमाण की अनदेखी कर दी जाती है। विकासात्मक योजनाएं प्रायः बड़ी, अवसंरचना-आधारित परियोजनाओं पर फोकस करती हैं, और भेद्य समूहों को निर्णय-सृजन प्रक्रियाओं से बाहर रखने की उनकी प्रवृत्ति होती है। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चिंताएं, भारत में राज्य सरकारों के नियोजन प्रारूप में हाल में जोड़ा गया विषय है, और इसे अभी मुख्य धारा में लाया जाना शेष है। कम आवृत्ति वाली विनाशकारी घटनाओं के सापेक्ष आपदा जोखिम घटोत्तरी पर अधिक जोर दिया गया है। इसके अलावा, छोटे और रोजमर्रा के जोखिम प्रायः बड़ी, अधिक तीव्र घटनाओं की तरह महत्त्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि वे भेद्यता बनी रहने में मुख्य भूमिका निभाते हैं।

मानव विकास प्रविधि, आपदा जोखिम के विरूद्ध लोचशीलता संभव बनाती है। जलवायु परिवर्तन एवं आपदा जोखिम के विरूद्ध समानतापूर्ण, सहभागितापूर्ण और धारणीय प्रतिक्रियाएं आवश्यक हैं। चूंकि ऐसे जोखिमों के परिमाण और प्रकृति का पूर्वानुमान कठिन और प्रायः अनदेखा होता है, इसलिए समुदायों, संपत्तियों व व्यवसायों में जोखिम के प्रति लोचशीलता निर्मित करने पर फोकस करना महत्त्वपूर्ण है। मानवीय विकास के प्रति सरोकार, तथा भेद्यता कम करने के लिए आवश्यक प्रयासों की पूर्ण समझ, लोचशीलता निर्माण के केंद्र में होना चाहिए। इसलिए यह अनिवार्य है कि आपदा जोखिम घटोत्तरी (डीआरआर) योजनाओं में उचित विकासात्मक उपायों तथा शीघ्र चेतावनी प्रणालियों के माध्यम से जलवायु संकटों के प्रति व्यक्तियों की भेद्यता घटाने की आवश्यकता समावेशित की जाए। इसी प्रकार, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन (सीसीए) में, आर्थिक व स्वास्थ्य संबंधी आघातों से उबरने हेतु समुदायों और परिवारों की क्षमता मजबूत बनाने वाले विकास के साथ, संपर्क व भेद्यता घटोत्तरी प्रविधियों को शामिल किया जाना चाहिए।

मानवीय विकास पर फोकस के साथ सीसीए और डीआरआर प्रविधि के एकीकरण के माध्यम से लोचशीलता निर्माण में नगरीय वृत्तिकारों को सक्षम बनाना, इस पाठ्‌यक्रम का ध्येय है। विभिन्न क्षेत्रों व पैमानों पर सीसीए, डीआरआर, और विकास योजनाओं, नीतियों व कार्यक्रमों को इस प्रकार डिजाइन व लागू करने का उद्‌देश्य है कि वे जलवायु एवं आपदा जोखिमों के प्रति व्यक्तियों, संपत्तियों (प्राकृतिक एवं निर्मित), तथा व्यवसायों की भेद्यता कम करें।

शिक्षणार्थियों की टिप्पणियां

18 से 23 नवम्बर, 2013 तक पाठ्‌यक्रम के प्रथम आयोजन पर शिक्षणार्थियों की टिप्पणियां

समग्र रूप में, एक बहुत ही अच्छा कार्यक्रम। संकाय सदस्यों व आयोजकों ने जिस तरह पाठ्‌यक्रम प्रस्तुत किया, उसे देखकर मैं उनकी सुयोग्यता की सराहना करता हूं।‘-डॉ. एस्थर, सीएमडीए

सत्र बहुत ज्ञानवर्धक रहे और व्यावहारिक परिस्थितियों पर आधारित थे‘-मीनाक्षी कुमारी, बीएमआरडीए 

सावधानीपूर्वक व्यवस्थित किए गए तथा प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किए गए- सुगातो दत्त, राज्य योजना आयोग, तमिलनाडु

09 से 14 दिसम्बर, 2013 तक पाठ्‌यक्रम के द्वितीय आयोजन पर शिक्षणार्थियों की टिप्पणियां

ज्ञानवर्धक पाठ्‌यक्रम। चर्चाएं जीवंत और प्रेरक रहीं। लोचशीलता के मसले के विश्लेषण हेतु इसने एक अंतरवैषयिक प्लेटफार्म प्रदान किया।

‘स्टूडियो अभ्यास बहुत प्रासंगिक था और विभिन्न अवधारणाएं व्यावहारिक तरीके से समझने में मदद मिली।’

इस पाठ्‌यक्रम ने हमारे सोचने के तरीके को उन्नत बनाया, विशेषकर हमारे क्षेत्र में लोचशीलता के संदर्भ में।

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संबंधित दस्तावेज

यूएनडीपी-आईआईएचएस संयुक्त वर्किंग पेपर
‘मानव विकास पर फोकस के साथ निर्धनता एवं भेद्यता घटोत्तरी, आपदा जोखिम घटोत्तरी एवं जलवायु परिवर्तन अनुकूलन।’